Tuesday, February 22, 2011

आखिरी अलविदा


मच्छरों के दल में उस दिन एक खुशी की लहर दौड़ी जिस दिन मच्छरों की केमिकल लैबोरेटरी ने एक ऐसा रसायन तैयार कर लिया जिससे जानसन की मौत तय थी। मच्छरों के प्रधानमंत्री मास्कू ने इस रसायन को खुद ही जानसन के शरीर में पहुंचाने का जिम्मा लिया।
           आमतौर पर जैसा होता है कि आदमी को मच्छर अपना दुश्मन समझता है, बिल्कुल वैसा यहां पर नहीं था। कुछ मच्छर उस इंसान को अपना दोस्त भी मान लेते, मगर यहां बात उनकी जिन्दगी की आ गई थी। वैसे आमतौर पर नर मच्छरों को इनसे कोई मतलब नहीं होता है। नर मच्छर तो केवल फूल पत्तियों के रस से जीवन निर्वाह कर लेते हैं।मानव जाति के किये गये किसी भी बड़े उलटफेर से उनका वास्ता बहुत कम बार ही पड़ता है। मगर इस बार मिस्टर जानसन के खिलाफ सारे मच्छर एकजुट थे। मिस्टर जानसन (मच्छरों के लिए सिर्फ जानसन), के खून में एक अजीब सा रसायन था। उनको जिस मच्छर ने काटा वह तुरन्त मौत के घाट उतर गया। छुटपन से ही जानसन ने यह रसायन सक्रिय हो गया था और यही कारण था कि जानसन का नाम मच्छर बिरादारी में बड़ी घृणा के साथ लिया जाता था। जानसन को सबक सिखाने के लिए न जाने कितने क्रांतिकारी मच्छर शहीद हो गये थे और न जाने कितने ही सक्रिय थे। उनकी मीडिया में आये दिन जानसन से सम्बन्धित लेख और सम्पादकीय निकलती रहती थी। उनमें जानसन को मच्छर जाति का विरोधी, क्रूर, सीरियल किलर और इस तरह की कई उपाधियों से नवाजा जाता और इसको पढ़ लेने के बाद नये मच्छरों का खून उबल जाता। प्रौढ़ मच्छर पहले से ज्यादा सतर्क हो गये थे और यही कारण था कि कुछ क्रान्तिकारी और सुसाइड केस मच्छरों को छोड़ कोई भी मच्छर मिस्टर जानसन के इर्द गिर्द नहीं घूमता था।


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    मिस्टर जानसन बिल्कुल वैसे नहीं थे जैसा कि मच्छरों के साहित्य में वर्णित था। वे तो बेहद ही नेकदिल और अहिंसा परस्त व्यक्ति थे। जब से उन्हें यह बात मालूम पड़ी थी कि उनका खून मच्छरों के लिए मौत का पैगाम लेकर आया है वे खुद को अधिक ढ़का हुआ रखते थे। दिन में लम्बा सा ओवरकोट पहनते थे। गले का कालर भी उठाकर रखते थे और ज्यादातर सिर ढका रखते थे। उन्हें अपनी इस असाधारणता पर दुख भी होता था और इसके लिए वह तरह-तरह के इलाज भी करा चुके थे। वह लगातार ऐसा करते रहे और तब तक किया जब तक कि उनको दवाईयों से इफेंक्शन नहीं हो गया। अब खुद को बचाकर रखना ही उसका उपाय था और वह अक्सर ऐसा ही करते थे। वे तब बहुत दुखी हो जाया करते जबकि इतने बचाव के बाद भी कोई न कोई मच्छर मर जाता। रात में वह मच्छरदानी लगाते थे और प्रयास करते कि कोई मच्छर उन्हें काटने न पाये।
    इधर मच्छरों का क्रोध जानसन पर दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा था। मच्छरों को यह विश्वास हो चला था कि जानसन मच्छर जाति को खत्म कर देना चाहता है। अब तक मच्छरों के कई बड़े और कर्मठ नेता भी मिस्टर जानसन का शिकार हो चुके थे और मच्छरो ने जानसन को ठिकाने लगाने की अपनी योजना पर काम भी शुरू कर दिया था। मच्छरों के दल में उस दिन एक खुशी की लहर दौड़ी जिस दिन मच्छरों की केमिकल लैबोरेटरी ने एक ऐसा रसायन तैयार कर लिया जिससे जानसन की मौत तय थी। मच्छरों के प्रधानमंत्री मास्कू ने इस रसायन को खुद ही जानसन के शरीर में पहुंचाने का जिम्मा लिया। मगर यह खुशी तब शोक में बदल गयी जब उस रसायन को पीते ही प्रधानमंत्री मास्कू की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। जनता ने लैबोरेट्री पर पथराव कर उसे बन्द कर दिया और जानसन पर किया जा रहा शोध रोक देना पड़ा। प्रधानमंत्री की मौत से मच्छर समुदाय का खून उबल पड़ा। जानसन बच्चों का भी बिलेन बन गया। जानसन पर कई बड़ी फिल्में सुपरहिट रहीं जिनमें मशहूर विलेन जिमी, टाफू और सिनी ने जानसन का रोल किया। मच्छरों के बीच आये दिन जानसन का पुतला फूंका जाता और धरना प्रदर्शन होता। सरकार पर लगातार जानसन को मारने का दबाव बढ़ता जा रहा था। विपक्ष के हंगामें का एकमात्र विषय जानसन बन गया था।
इसी बीच अखबारों में एक अफ्रीकन मच्छर लिली के आने के खबर प्रकाशित हुई। इस स्टिंग आपरेशन के बाद पुलिस का ध्यान लिली पर पड़ा और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अगने दिन की कोर्ट कार्यवाही के बाद उसे रिमाण्ड पर ले लिया गया। लिली से पुलिस ने कड़ी पूछतांछ की और पाया कि लिली अफ्रीकी देश जारा से आई है। उसकी लम्बी यात्रा का कारण उसकी एक असाधारण ताकत है। लिली को तुरन्त सरकार की कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। कैबिनेट ने बातचीत के बाद लिली को इस शर्त पर छोड़ना चाहा कि वह मिस्टर जानसन को मारे। लिली ने जानसन वाली बात मानने से इंकार कर दिया। लिली पर जासूसी का मुकद्मा चलाया गया और जैसा कि मच्छर कानून में जासूसी के लिए मृत्युदण्ड वर्णित था लिली को दिया गया। अब अगले दिन लिली को मौत लगे लगाना ही था।
    सरकार इस मौके को जाने देना नहीं चाहती थी इसलिए तत्कालीन मच्छर प्रधानमंत्री राना जेन स्वयं उससे मिलने पहुंचे। प्रधानमंत्री को देखते ही लिली ने झुककर सलाम किया। प्रधानमंत्री ने उसे बताया कि अगर वह जानसन वाली बात मान ले तो उसकी सजा माफ हो सकती है और वह इनाम की हकदार भी हो सकती है। मगर लिली अपनी जान बचाने के लिए किसी निर्दोष की हत्या करने को तैयार नहीं थी। उसे जब यह मालूम पड़ा कि जानसन एक हत्यारा है तो उसने अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने का मन बना लिया।
    मच्छर समुदाय के बच्चे-बच्चे तक यह बात पहुंच गई कि अब जानसन की मौत तय है और सभी इस बार पहले से कहीं अधिक सतर्क दिखाई दे रहे थे। लिली को रिहा कर दिया गया और उसे इस काम के लिए एक महीने का समय दिया गया। जानसन इन बातों से बिल्कुल बेखबर था और अपनी दैनिक दिनचर्या को व्यवस्थित बनाता हुआ जी रहा था। सुबह से शाम तक अपने शरीर को ढके रखने में ही उसका ध्यान रहता था और इसी वजह से लिली को काम को अंजाम देने का मौका नहीं मिल पाया था। एक दिन मिस्टर जानसन अपनी मच्छरदानी में आराम से लेटे हुए थे और नींद लेने के करीब पहुंचे ही थे कि एक मच्छर की गूंज उनके कानों में सुनाई दी। वह झटके से दूर हो गये और उस मच्छर से न काटने का आग्रह किया। लिली ने बताया कि वह कई दिनों की भूखी है और वह उसे काटकर अपना पेट भरना चाहती है। जानसन ने हंसते हुए बताया कि ऐसे तो वह अपना पेट फाड़ लेगी और मौत को गले लगा लेगी। जानसन ने लिली को भोजन दिया और बाद में कुछ फलों का रस और बियर का आनन्द भी।  उस दिन लिली ने भरपेट खाना खाया। खाने के बाद लिली ने जानसन को काटने का मन बदल दिया। लिली ने जानसन को कई सारे गाने सुनाये और जानसन ने भी लिली को दुनिया की तमाम अजीब दस्तानें बतायीं। फिर दोनों ने अपनी-अपनी यात्राओं का बढ़ा-चढ़ा कर रोचक ढंग से वर्णन किया और वे अच्छे दोस्त बन गये। अब लिली और जानसन अधिकतर मिल लिया करते। जानसन जब भी आफिस जाता लिली भी उसके साथ होती। अक्सर ठण्ड में वह उसके ओवरकोट में छिपी रहती और फुर्सत मिलते ही बाहर निकलकर जानसन से बातें करती। कुछ ही दिनों में जानसन और लिली एक दूसरे की जिन्दगी का हिस्सा बन गये। अगर जानसन कभी बीमार पड़ जाता तो लिली उसका ख्याल रखती और जानसन भी लिली को उतना ही चाहता। जानसन तो कुछ दिनों में ही सही हो गया मगर लिली इस बीच कुछ परेशान रहा करती। उस पर आये दिन दबाव बढ़ता जा रहा था। कैबिनेट ने उसे कई बार दफ्तर तलब किया और मंत्रालय लगातार उस पर निगरानी बनाये हुये था। मीडिया भी लिली को लेकर तमाम अटकलें लगा रहा था। इधर कई दिनों से तंग आकर लिली ने अखबार पढ़ना छोड़ दिया था। वह उदास रहा करती थी। जानसन के पूछने पर वह हर बात को टाल जाती। जानसन इस उदासी के बीच लिली को खुश करने की भरपूर कोशिश करता मगर लिली और दुखी हो जाती। वह बस इतना कहती कि वे ज्यादा दिनों तक साथ नहीं रह सकते। जानसन यह सुनकर दुखी हो जाता और सोचता कि लिली को ऐसा क्यूं लगता है। लिली पर वह कभी दबाव नहीं बना पाता और लिली हमेशा उसकी इस बात को टाल जाती। अब लिली के पास एक दिन और था। लिली ने यह बात जानसन को बताई। जानसन ने लिली को सबसे अच्छे होटल का खाना खिलाया, दोनों ने साथ-साथ शराब पी और जानसन ने अपनी सबसे पहली वाली प्रेयसी के बारे में लिली को बताया। उसने यह भी बताया कि वह लिली को कितना प्यार करता है। अगले दिन की सुबह लिली जल्दी उठ गई। उसने जानसन को आखिरी गुड मार्निंग कहीं और बताया कि इसके बाद कोई लिली उसे गुड मार्निंग नहीं कहेगी। लिली और जानसन ने मिलकर आंसू बहाये और फिर लिली ने जानसन को काट लिया। जानसन को इस बात का पता नहीं चल पाया। उसे लिली से आग्रह किया कि वह उसे यह बताये कि वे आखिर क्यूं नहीं मिल सकते।
    लिली पूरी तरह टूट चुकी थी। उसने जानसन से कहा कि वह उसे माफ कर दे। अगले पांच मिनट बाद वे एक दूसरे से जुदा हो जायेंगे। उसने बताया कि वह एक अद्भुद शक्ति की मालिका है। वह जिस भी इंसान को काट लेती है, उसकी कुछ मिनटों में ही मौत हो जाती है। फिर वह इंसान केवल इसी शर्त पर बच सकता है कि लिली उसे दोबारा काटे। उसने बताया कि अफ्रीका में उसने कई लोगों का काटा था। उसे ऐसा नहीं मालूम था और लोगों की जाने लगतार जा रही थीं। मनुष्यों का जब इस बात का पता चला तो वह मच्छर जाति से घृणा करने लगे। वहां मनुष्यों ने बड़े स्तर पर मच्छरों का विनाश कर डाला। कई करोड़ मच्छर मारे गये और समूची मच्छर जाति पर संकट आ गया। उसे अफ्रीका छोड़ देना पड़ और वह यहां आ गई।
    जानसन इस बात को बड़ी गम्भीरता से सुन रहा था और यह समझने की कोशिश कर रहा था कि इन बातों का लिली के जाने से क्या सम्बन्ध है। क्या अफ्रीकी मच्छरों ने उसे वापस बुला लिया है या लिली अपने परिवार से मिलने के लिए जबरन अफ्रीका में घुसना चाहती है। तभी लिली की एक बात ने उसका ध्यान भंग कर दिया। उसने बताया कि वह उसे काट चुकी है। जानसन यह सुनकर डर गया। उसे लाग कि उसका सिर घूम रहा है और उसके सामने अंधेरा छा गया। उसको अपनी दोस्ती की इतनी भयानक सजा मिलने वाली थी उसने नहीं सोचा था। उसको लिली पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह लिली को मार देना चाहता था। मगर उसके प्यार ने उसे ऐसा न करने पर मजबूर कर दिया था। लिली बोलती जा रही थी। वह कह रही थी कि वापस आने पर उसे पकड़ लिया गया और उसे मृत्युदण्ड हो गया। उसने बताया कि आज उसे मारने पर बहुत सारा इनाम मिलेगा। वह यहां की कैबिनेट में मंत्री बना दी जायेगी और सरकारी सुविधायें और ठाठ बाट उसे मुहैया हो जायेंगे।
    इतना बोलते-बोलते लिली गिर पड़ी। अब वह उड़ नही पा रही थी। जानस ने उसे हाथ पर उठा लिया। लिली ने जानसन के फीके चेहरे की ओर देखा और फिर मुस्कराई, ‘‘जानसन, मेरे प्यारे जानसन, यह सब मैंने मच्छरों की भलाई के लिए किया। मुझे माफ कर देना जानसन। वैसे एक बात बोलूं जानसन, मैंने तुम्हारा सारा जहर चूस लिया है। अब मच्छरों को तुमसे कोई खतरा नहीं है। दरअसल मैंने तुम्हें दोबारा काटा था। अब तुम एक आम आदमी हो जानसन। अलविदा, आखिरी अलविदा! दुनिया के सबसे प्यारे इंसान को लिली का आखिरी अलविदा।’’


By 
Alok Dixit

                                                                                                                                                                  
                                                                                      

Saturday, February 19, 2011

टुनिशिया, मिस्र और यमन, अल्जीरिया के आगे पार्ट-2...लीबिया, बहरीन, तुर्की और जार्डन

उत्तर भारत के गावों में एक कहावत कही जाती है- "बुढ़िया के मरने का डर नहीं है, डर तो इस बात का है कि यम परक # जायेंगे' . टुनिशिया, और मिस्र की क्रांतियों से लगता है मानो  अफ्रीका में यम परक गए हो !
 यमन में अठारह दिनों तक चले संघर्ष के बाद जिस तरह से मोनार्ची का अंत हुआ है उससे समूचे अफ्रीका में भूचाल आ गया है. पड़ोसी देशों में भी इस बात को लेकर ये आशा जगी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से तख्ता पलट किया जा सकता है . प्रदर्शनों की जो शुरूआत पिछले दिनों यमन और अल्जीरिया से हुई वो भले ही तत्काल कोई असर नहीं छोड़ पायी मगर उसका असर अब बहरीन, लीबिया, जार्डन और तुर्की में देखने को मिल रहा है.
 पिछले तीन दिनों में ही तुर्की में लगभग सौ लोगों की मौत हो चुकी है और प्रदर्शन तेज होता जा रहा है. बहरीन में भी परिस्थितियाँ बेकाबू है जहाँ शुक्रवार को नमाज के बाद लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा और सेना को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. यमन में पहले ही दबाव में आकर 30 सालों से सत्ता में बैठे  प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला सालेह ने २०१३ में गद्दी छोड़ देना का ऐलान कर दिया है . जार्डन में भी राष्ट्रपति शाह अब्दुल्ला द्वितीय की शक्तियों को सीमित करने की मांग जोरों से उठ रही है. तुर्की में देशद्रोह के आरोपों में उम्रकैद की सजा झेल रहे अब्दुल्ला की रिहाई की मांग जोर पकडती जा रही है . यही हाल लीबिया का भी है. वहां कर्नल मोहम्मद गद्दाफी की ४० सालों की हुकूमत से लोग त्रस्त आ गए हैं.





 ट्यूनीशिया में मरी बुढ़िया से सारे अफ्रीका में यमों की आवाजाही तेज हो गयी है , देखना होगा कि अरब में कितनी बुढ़िया मरती हैं और यम अफ्रीका से रास्ता बदल कर इरान, अफगानिस्तान और पकिस्तान होते हुए चाइना तक पहुँचते है या नहीं ?




आलोक दीक्षित 
07499219770
09651411891
# ( Its not the matter that Grand mother died, the matter is that Yamraj will know this place).

Thursday, February 17, 2011

आओ आपको एक कहानी सुनाता हूं..(जो सच्ची है और गन्दी है और बोरिंग है)

इसको मजे लेने के लिए ना पढ़ें, कहानी सोलहों आने सच है और इसलिए पूरी तरह बोरिंग है ..मै इसमें कनक्लुजन भी नहीं दूंगा 


सपने दो तरह के होते है . एक जो खुली आँखों से देखे जाते हैं और दूसरे जो आँखे बंद करके. इंडिया में हर लड़की बस एक ही सपना देखती है कि दुनिया कि सबसे ज्यादा खुशियाँ उसके पास हों और कोई सपनो  का राजकुमार आकर उसे दूर देश में कही वादियों के बीच ले जाये . हो सकता है कि आप एक लड़की हों और इस बात से इत्तेफाक ना रखती हों कि उज लड़की का बस यही सपना होता है.  मगर मै तो बस यह कर रह हूँ कि सपने सब देखते है, और कम से कम इत्याह तो तय ही है कि   कि दुनिया का कोई भी इंसान अबने बारे में बुरा नहीं सोंचता होगा. अब अगर यह सच है तो मै जिस लड़की कि कहानी सुना रह हूँ वो उन सपनों के एकदम उलट है . वो लड़की है आरती सरन.

आरती सरन भी बचपन से एक ही सपना लेकर बड़ी हो रही थी और वो था कि एमबीए करने के बाद वो ढेर सारा पैसा कमाएगी और फिर मायानगरी में जाकर फिल्मों में एक्टिंग के लिए ट्राई करेगी. वो सुन्दर थी और पड़ने में काफी तेज भी थी. उसके पिता प्रताप भी आरती को लेकर ढेर सारी उम्मीदें पाले बैठे थे क्यूंकि उनकी तीन बेटियों में आरती ही सबसे होनहार थी. मगर तभी आरती कि जिंदगी में एक तूफ़ान सा आ गया. उसके सपनो पर तेज़ाब पड़ गया. वो बुरी तरह झुलस गयी.उसका चेहरा जो अब तक बहुत सुन्दर था कुछ ही  मिनटों में दुनिया के सबसे खराब चेहरों से भी खराब चेहरा बन गया. राह चलते कुछ लड़कों ने उस पर तेज़ाब डाल दिया था. उसका चेहरा बुरी तरह झुलस गया और वो हमेशा हमेशा के लिए दुनिया की सबसे बदसूरत लड़की बन गयी.

हर केस की तरह यहाँ भी पुलिस ने मामले की रिपोर्ट दर्ज कर ली, मुख्य अभियुक्त अभिनव और उसके दो साथियों के खिलाफ पुलिस कि जांच शुरू हुई . अभिनव एक आयकर आयुक्त का बेटा था इसलिए लगातार जांच के पहलू बदलते रहे . पुलिस और प्रसाशन द्वारा अभिनव को बचाने की हर संभव कोशिस की गयी . लोकल मीडिया ने मामले को लगातार लाइमलाईट  में रखा और प्रशासन पर लागतार दबाव बनाए रखा . बावजूद इसके पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में ढेर सारी खामियां छोड़ दी जिससे अभियुक्त को हाईकोर्ट से सती मिल गया. अभिनव इस बीच लगातार बचता रहा और उसने पुणे से एमबीए कर किया और फिर अमेरिका जाकर जॉब करने लगा. इन्ही सब के बीच उसकी शादी भी हो गयी और वो एक खुशहाल जिन्दगी जीता रहा. दूसरी तरफ आरती और उसकी पिता इलाज के लिए हर जगह भटके. कानपुर से लखनऊ और फिर दिल्ली और इसके बाद मुंबई और फिर पुणे. प्रताप सरन हर जगह गए और हर कोशिश की कि उनकी बेटी को दर्द से कुछ राहत मिल सके. इस बीच उन्होंने अपनी पारिवारिक संपत्ति बेंच डाली, नौकरी से रिटायरमेंट ले लिया और कानपूर छोड़कर ग्वालयर  शिफ्ट हो गए. आये दिन अस्पतालों और कचहरी के चक्कर लगाते लगाते वे इतने परेशान हो गए कि उन्होंने आरती को न्याय मिलने की आशा ही छोड़ दी. घर से ही उन्होंने तमाम महिला संगठनों को लेटर लिखा, सोनिया गाँधी को लेटर लिखा और भारतीय महिला आयोग को भी लेटर लिखा . प्रताप बाते है कि, "एक समय तो हमने ये आशा ही छोड़ दी थी कि हमें न्याय भी मिल पायेगा. कानपुर में मेरा जीना ही दूभर हो गया था. आयेदिन हम पर समझौतों के तमाम दबाव पड़ रहे थे. जब मैंने इनकार कर दिया तो मुझे अलग अलग तरीकों से परेशान किया जाने लगा. आखिरकार हारकर मैंने कानपुर ही छोड़ दिया और ग्वालियर में अपने रिश्तेदारों के साथ रहने लगा."

कहानी बाद में लम्बी और बोरिंग होती गयी, वही न्याय के लिए भटकना, वही कोर्ट कचहरी के चक्कर, वही आपरेशंस, पहला वाला, दूसरा वाला, फिर तीसरा, फिर चौथा, फिर ना जाने कितने,और इन्सबके बीच आप्रेसंस के खर्चे. कहानी इतनी बोर हुई को लोगों को मजा आना बाद हो गया, लोगों ने सहानुभूति की मात्रा कम कर दी, मीडिया को कहानी पुरानी लगने लगी. अब तो वकील साहब भी चिडचिडाने लगे थे, लोगों ने फोन अटेंड करने बंद कर दिए थे ...कहानी काफी बोरिंग थी ना .
( अभी चलती रहेगी)

Saturday, February 12, 2011

टुनिशिया, मिस्र और यमन, अल्जीरिया




कल मिस्र में मुबारक के गद्दी छोड़ देने के बाद और पडोसी अफ्रीकी देशों में अचानक आयी क्रान्तियों के बाद देश दुनिया में लगातार यह कयास लग रहे हैं कि अफ्रीका में एक बड़ा बदलाव आयेगा. हाल ही में जिन बदलावों की बात की जा रही है वे हैं यमन और अल्जीरिया. जैसे ही मिस्र में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक नें गद्दी छोड़ने का ऐलान किया पड़ोसी देश अल्जीरिया में लोग सड़कों पर उतरने लगे. लगता है मिस्र में मुबारक के तख्तापलट के बाद लोकतंत्र की मांग का वायरल पूरे अफ्रीका में तेजी से फैलेगा.
यमन की राजधानी सना में कुछ दिनों पहले बुधवार के दिन जिस तरह विपक्षी पार्टियों ने विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया था और हड़बड़ी में प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला सालेह ने 2013 में बिना किसी उत्तराधिकार के गद्दी छोड़ने का ऐलान कर दिया था उससे देश दुनिया को यह लगने लगा कि मिस्र के बाद अब यमन ही स्वतंत्रता पाने वाला अगला देश होगा. मगर अगर अफ्रीका के इतिहास पर गौर करें तो यह साफ समझ आ जायेगा कि यमन की मुसीबतें कम नहीं हैं. यमन अफ्रीका के सबसे गरीब देशों में से एक है और प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला की जड़ें वहां काफी मजबूत बताई जातीं हैं. वैसे इसका एक उदाहरण बुधवार के बाद हुये प्रदर्शन में भी मिला जब 40 हजार की भीड़ सना यूनिवर्सिटी पर एकत्र हुयी मगर वहां न तो कोई गर्मागर्मी हुयी और न कोई बड़ी मांग. फिलहाल अल्जीरिया के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं. लोकतंत्र की मांग वहां भी रहरह कर उठती रही है. मगर हरबार राष्ट्रपति अब्दल अज़ीज़ बूतेफ्लिका की तानाशही अब तक के किसी भी प्रदर्शन पर भारी ही पड़ी है. मिस्र के घटनाक्रम से उत्साहित आज़ादी के समर्थकों नें जब एक विशाल रैली करने का फैसला किया तो राजधानी अल्जीयर्स में लोकतंत्र के समर्थन में होने वाली इस रैली पर प्रतिबंध लगा दिया गया. अल्जीयर्स में भारी मात्रा में पुलिस बल की तैनाती के कारण कोई भी बड़ा विरोध देखने को नहीं मिला और मिस्र की गर्म हवा का सीधा असर अल्जीरिया और यमन पर नहीं नहीं पड़ पाया. आजादी की इस आवाज को दबा दिया गया.
इतिहास गवाह है कि आन्दोलनों को शुरूआत में हमेशा ही दबाया गया है. इससे पहले भी टुनिशिया और मिस्र जैसे आंदोलनों की शुरुआत को रोकने के लिए जो कुछ किया गया वह किसी से छिपा नहीं है. दुनिया के अधिकतर देशों में परिवर्तन बड़ी मुश्किलों के बाद ही आया है. अफ्रीकी परिस्थितियों को देखते हुये सम्भव है कि क्रान्ति आने में कुछ देर लग जाय मगर यह तो तय है कि लोकतंत्र का बीज अफ्रीका में अंकुरित हो चुका है .

Friday, February 11, 2011

यमन का चमन अभी नहीं....

कल मिस्र में मुबारक के गद्दी छोड़ देने के बाद और अफ्रीकी देशों में अचानक आयी क्रान्तियों के बाद देश दुनिया में लगातार यह कयास लग रहे हैं कि अफ्रीका में एक बड़ा बदलाव आयेगा. हाल ही में जिस बदलाव की बात की जा रही है वह है यमन. राजधानी सना में कुछ दिनों पहले बुधवार के दिन जिस तरह विपक्षी पार्टियों ने विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया था और हड़बड़ी में प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला सालेह ने 2013 में बिना किसी उत्तराधिकार के गद्दी छोड़ने का ऐलान कर दिया था उससे देश दुनिया को यह लगने लगा कि मिस्र के बाद अब यमन ही स्वतंत्रता पाने वाला अगला देश होगा.
मगर अगर अफ्रीका के इतिहास पर गौर करें तो सह साफ समझ आ जायेगा कि यमन की मुसीबतें कम नहीं हैं. यमन अफ्रीका के सबसे गरीब देशों में से एक है और प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला की जड़ें वहां काफी मजबूत बताई जातीं हैं. वैसे इसका एक उदाहरण बुधवार के बाद हुये प्रदर्शन में भी मिला जब 40 हजार की भीड़ सना यूनिवर्सिटी पर एकत्र हुयी मगर वहां न तो कोई गर्मागर्मी हुयी और न कोई बड़ी मांग. दोपहर के बाद ही सड़कों पर सन्नाटा पसर गया और प्रदर्शनकारी नदारद रहे. खुद आयोजकों नें प्रदर्शनकारियों से यह मांग की कि वे वे पोस्टर उतार दें, बैनर फोल्ड कर लें और घर लौट जायें. विपक्ष की कमजोरी और यमन के पिछड़पन के कारण अभी संम्भानायें यहीं हैं कि क्रान्ति आने में अभी देर लगेगी.
{Photo:- BBC Hindi}

Tuesday, February 1, 2011

आओ आपको एक कहानी सुनाता हूं....(जो सच्ची है और गन्दी है)

पाकिस्तान में इस वक्त acid survivors bill पर बहस चल रही है. Acid attacks के लगातार बढ़ रहे cases को देखते हुये यह वक्त की जरुरत बन गयी है कि acid attacks पर कोई स्पेसिफिक law बनाया जाये. बांग्लादेश ने सबसे पहले (10 साल पहले) Acid Bill इन्ट्रोड्यूस करके इस दिशा में दूसरे देशों को अब दबाव की स्थिति में ला दिया था (इंडिया को नहीं).

आओ आपको एक कहानी सुनाता हूं....

..............यह आरती की जिन्दगी है

आरती अब पढ़ाई पूरी कर चुकी है. टाइमपास करने का यह उसका यह आखिरी बहाना भी खत्म हो गया है. एमए करने के साथ ही उसने ब्यूटीपार्लर का भी कोर्स कर लिया था और अब खाना बनाने के साथ साथ वो टाइमपास के लिये अपनी आर्ट कापियों पर पेंटिग करती है. एक दो ट्यूशन पढाने के अलावा वह अब कुछ नही कर सकती. वह कही भी नार्मल फील नहीं करती है. बाहर जाकर जाब करना अब उसके लिये सम्भव नहीं. य़ह सब इसलिये क्योंकि आरती एक ऐसिड सर्वाइवर है.

आरती का बचपन कानपुर की उन गलियों में बीता है जिनको अब वह सपने में भी याद नहीं करना चाहती है. इसी कानपुर में उसने अपना पहला कदम रखा, बोलना सीखा, गिल्ली डंडा खेला, रोड पर खड़े होकर क्रिकेट मैच देखा और पतंग उड़ाने के लिये कई कई बार स्कूल बंक किया. 17 साल उसने यहां बड़े आराम से गुजारे. इन 17 सालों में आरती ने कई सारे दोस्त बनाये, जमकर पढ़ाई की और ढ़ेर सारे ख्वाब देखे. हर मिडिल क्लास लड़की की तरह आरती के भी ढ़ेर सारे सपने थे. सपना एक आलीशान घर का, एक लम्बी सी गाड़ी का और सबसे बड़ा सपना उस सपनों के राजकुमार का जो उसे वहां से उठाकर ख्वाबों की दुनिया मे ले जाने वाला था. सपनों के बीच अपनों की तलाश में उसकी मुलाकात अभिनव से होती है (मीडिया रिपोर्टस् के अनुसार, हालाकि मुझसे बातचीत के दौरान वह लगातार यह दोहराती है कि वह अनुभव को नहीं जानती थी ) और कुछ निजी कारणों से वह उस पर तेजाब डाल देता है. समझ लीजिये कि उसके सपनों पर तेजाब पड़ जाता है.

अब आज का दिन है जब आरती की आखों में कोई सपना नहीं है और सपनों में कोई राजकुमार नहीं है. पिछले 10 सालों में उसने यही उम्मीद की है कि कोई दिन ऐसा आयेगा जब वह आइने के सामने खड़ी हो सकेगी, खुद को हर सेकेंड़ के भयानक दर्द से राहत राहत दिला सकेगी, रास्ते चलते लोगों की उसे अजीब प्रजाति समझकर घूरने की आदत बन्द करा सकेगी. आशा तो उसे यह भी थी कि कम से कम अब तो तेजाब के खुले बाजार पर रोक लगेगी, उसके जैसे कइयों के लिये कोई कानून आयेगा, सरकारी राहत से वह मां बाप पर बोझ नहीं बनेगी.

(…………………to be continued in my next post)

Sunday, January 30, 2011

रश्मि जी के कमेन्ट पर दो बातें (प्रतिक्रया के तौर पर)


दखलंदाजी पर कि हुई पोस्ट मोटी मलाई पर सबकी नजर पर असीम की प्रतिक्रिया

सही कहा अलोक भाई, बीसीसीसीआई में भ्रस्टाचार के इतने अवसर देखकर सरकार की खोपड़ी ठनक गयी है और वहा भी अपना रेगुलेटर लगाकर भ्रस्टाचार के नए रेकार्ड्स बनाना चाहती है.

फिर रश्मि जी की प्रतिक्रिया

क्या बात कही है आपने ....
Alok ji! खेल तो खेल सरकार सीबीआई को भी रेगुलेट कर लेती है. बस नही कर पाती है तो भ्रस्टाचार को, मंहगाई को, गरीबी को, बेरोजगारी को और काले धन को............. ये वो सच है जिसका जवाब सरकार के पास बिलकुल नहीं है ...इस पर वो बगले झाकती नजर आएगी ..... its really controversial funda of govt.

हमारा संवाद

सोचता हूँ तो कभी कभी लगता है कि अगर हम एक समाज में रह रहे है तो कम से कम समाज वाला ढाचा तो होना ही चाहिए. मै अब तक जिस किसी सिद्धांत से सबसे ज्यादा इंस्पायर हुआ हूँ वो है डार्विन का सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट......मुझे हमेशा से उसकी बात सच लगती रही है ...मगर यह सच जंगल का है , जानवरों का है, मेरी गली में मैं जिन जिन कुत्तों को देखता हूँ यह उनका सच है ...मगर जैसे जैसे बड़ा हो रहा हूँ, समाज को करीब से देख रहा हूँ , वैसे वैसे लग रहा है कि हम सब भी अब तक एक जानवर ही हैं , एक बड़े वाले जानवर.

तो फिर अगर सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट ही सही है तो कैसी सरकार, कैसा समाजवाद और कैसी डेमोक्रेसी? अगर एक सरकारी पुलिस पब्लिक कि सुरक्षा नहीं कर सकती, एक सरकारी संस्था खेलों का हित नहीं कर सकती तो फिर हम क्यूँ सोचे कि सरकार का नियंत्रण रहे ...हम आसानी से प्राइवेट गार्ड रख कर भी तो काम चलाते हैं ना ..

Friday, January 28, 2011

अजीत साही





प्रसिद्ध पत्रकार अजीत साही इजरायल में

Tuesday, January 25, 2011

कुत्ता बनने की ख़ुशी

मेरी सबसे अच्छी बात
कि मै दुखी रहता हूँ
सोचता हूँ तो लगता है कि आहा क्या बात है !
वाह मजा आ गया कि मै दुखी रहता हूँ .

समझ पाना कठिन है
मगर सोंचो
अरे अगर खुश रहता तो क्या समझ पाता
कि दुनिया दुखी कैसे रहती है ?
माना कि किसी मूवी में देख लेता या किसी कहानी में पढ़ लेता कि
दुखी ऐसे हुआ जाता और कुढा ऐसे जाता है
या कुत्ता वैसे बन जाया जाता है

मगर बिना कुत्ता बने ये समझ पाना तो एकदम पोसिबल नहीं था ना !
अब जब भी कोई कहता है कि वो दुखी है
तो मै बड़ा खुश हो जाता हूँ
अरे सोरी मेरा मतलब है कि दुखी हो जाता हूँ
और लगता है जिंदगी में हर चीज काम आती है
कुता बनना भी .

Saturday, January 22, 2011

गौरव सोलंकी कहानी

तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं और नॉस्टेल्जिया

मेरा मन है कि मैं उसे कहानी सुनाऊँ। मैं सबसे अच्छी कहानी सोचता हूं और फिर कहीं रखकर भूल जाता हूं। उसे भी मेरे बालों के साथ कम होती याददाश्त की आदत पड़ चुकी है। वह महज़ मुस्कुराती है।

फिर उसका मन करता है कि वह मेरे दाएँ कंधे से बात करे। वह उसके कान में कुछ कहती है और दोनों हँस पड़ते हैं। उसके कंधों तक बादल हैं। मैं उसके कंधों से नीचे नहीं देख पाता।

- सुप्रिया कहती है कि रोहित की बाँहों में मछलियाँ हैं। बाँहों में मछलियाँ कैसे होती हैं? बिना पानी के मरती नहीं?

मैं मुस्कुरा देता हूं। मुस्कुराने के आखिरी क्षण में मुझे कहानी याद आ जाती है। वह कहती है कि उसे चाय पीनी है। मैं चाय बनाना सीख लेता हूं और बनाने लगता हूं। चीनी ख़त्म हो जाती है और वह पीती है तो मुझे भी ऐसा लगता है कि चीनी ख़त्म नहीं हुई थी। मैं सबसे अच्छी कहानी सोचता हूं और फिर कहीं रखकर भूल जाता हूं। उसे भी मेरे बालों के साथ कम होती याददाश्त की आदत पड़ चुकी है। वह महज़ मुस्कुराती है।

- तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं?

- मुझे तुम्हारे कंधों से नीचे देखना है।

- कहानी कब सुनाओगे?

- तुम्हें कैसे पता कि मुझे कहानी सुनानी है?

- चाय में लिखा है।

- अपनी पहली प्रेमिका की कहानी सुनाऊँ?

- नहीं, दूसरी की।

- मिट्टी के कंगूरों पर बैठे लड़के की कहानी सुनाऊँ?

- नहीं, छोटी साइकिल चलाने वाली बच्ची की। और कंगूरे क्या होते हैं?

- तुम सवाल बहुत पूछती हो।

वह नाराज़ हो जाती है। उसे याद आता है कि उसे पाँच बजे से पहले बैंक में पहुँचना है। ऐसा याद आते ही बजे हुए पाँच लौटकर साढ़े चार हो जाते हैं। मुझे घड़ी पर बहुत गुस्सा आता है। मैं उसके जाते ही सबसे पहले घड़ी को तोड़ूंगा।

मैं पूछता हूं, "सुप्रिया और रोहित के बीच क्या चल रहा है?"

- मुझे नहीं पता...

मैं जानता हूं कि उसे पता है। उसे लगता है कि बैंक बन्द हो गया है। वह नहीं जाती। मैं घड़ी को पुचकारता हूँ। फिर मैं उसे एक महल की कहानी सुनाने लगता हूं। वह कहती है कि उसे क्रिकेट मैच की कहानी सुननी है। मैं कहता हूं कि मुझे फ़िल्म देखनी है। वह पूछती है, "कौनसी?"

मुझे नाम बताने में शर्म आती है। वह नाम बोलती है तो मैं हाँ भर देता हूं। मेरे गाल लाल हो गए हैं।

उसके बालों में शोर है, उसके चेहरे पर उदासी है, उसकी गर्दन पर तिल है, उसके कंधों तक बादल हैं।

- कंगूरे क्या होते हैं?

अबकी बार वह मेरे कंधों से पूछती है और उत्तर नहीं मिलता तो उनका चेहरा झिंझोड़ने लगती है।

मैं पूछता हूं - तुम्हें तैरना आता है? वह कहती है कि उसे डूबना आता है।

मैं पूछता हूं - तुम्हें तैरना आता है?

वह कहती है कि उसे डूबना आता है।

और मैं आखिर कह ही देता हूं कि मुझे घर की याद आ रही है, उस छोटे से रेतीले कस्बे की याद आ रही है। मैं फिर से जन्म लेकर उसी घर में बड़ा होना चाहता हूं। नहीं, बड़ा नहीं होना चाहता, उसी घर में बच्चा होकर रहना चाहता हूं।

मुझे इतवार की शाम की चार बजे वाली फ़िल्म भी बहुत याद आती है। मुझे लोकसभा में वाजपेयी का भाषण भी बहुत याद आता है। मुझे हिन्दी में छपने वाली सर्वोत्तम बहुत याद आती है, उसकी याद में रोने का मन भी करता है।

उसमें छपी ब्रायन लारा की जीवनी बहुत याद आती है। गर्मियों की बिना बिजली की दोपहर और काली आँधी बहुत याद आती है। वे आँधियाँ भी याद आती हैं, जो मैंने नहीं देखी लेकिन जो सुनते थे कि आदमियों को भी उड़ा कर ले जाती थी। अंग्रेज़ी की किताब की एक पोस्टमास्टर वाली कहानी बहुत याद आती है, जिसका नाम भी नहीं याद कि ढूंढ़ सकूं। मुझे गाँव के स्कूल का पहली क्लास वाला एक दोस्त याद आता है, जिसका नाम भी याद नहीं और कस्बे के स्कूल का एक दोस्त याद आता है, जिसका नाम याद है, लेकिन गाँव नहीं याद। वह होस्टल में रहता था। उसने 'ड्रैकुला' देखकर उसकी कहानी मुझे सुनाई थी। उसकी शादी भी हो गई होगी...शायद बच्चे भी। वह अब भी वही हिन्दी अख़बार पढ़ता होगा, अब भी बोलते हुए आँखें तेजी से झिपझिपाता होगा।

लड़कियों के होस्टल की छत पर रात में आने वाले भूतों की कहानियाँ भी याद आती हैं। दस दस रुपए की शर्त पर दो दिन तक खेले गए मैच याद आते हैं। शनिवार की शाम का 'एक से बढ़कर एक' याद आता है, सुनील शेट्टी का 'क्या अदा क्या जलवे तेरे पारो' याद आता है। शंभूदयाल सर बहुत याद आते हैं। उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम क्रिएटिव हो और मैं उसका मतलब जाने बिना ही खुश हो गया था। एक रद्दीवाला बूढ़ा याद आता है, जो रोज़ आकर रद्दी माँगने लगता था और मना करने पर डाँटता भी था। कहीं मर खप गया होगा अब तो।

वह कंगूरे भूल गई है और मेरे लिए डिस्प्रिन ले आई है। उसने बादल उतार दिए हैं। मैंने उन्हें संभालकर रख लिया है। बादलों से पानी लेकर मेरी बाँहों में मछलियाँ तैरने लगी हैं। हमने दीवार तोड़ दी है और उस पार के गाँव में चले गए हैं।

कुछ देर बाद वह कहती है – मिट्टी के कंगूरों पर बैठे लड़के की कहानी सुनाओ।

मैं कहता हूं कि छोटी साइकिल चलाने वाली लड़की की सुनाऊँगा। वह पूछती है कि तुम्हें कौनसी कहानी सबसे ज़्यादा पसन्द है?

मैं नहीं बताता।

गौरव सोलंकी

(ब्लॉगिंग की दुनिया में सक्रिय गौरव सोलंकी एक आई टी कंपनी में कार्यरत हैं.)

Wednesday, January 19, 2011

मोटी मलाई पर सबकी नजर




हांकी को चौपट करने के बाद अब खेल मंत्रालय का दिल क्रिकेट पर आ गया है. मंत्रालय खेलों को रेगुलेट करने के नाम पर बीसीसीआई पर यह दबाव बनाने में जुटा है कि बीसीसीआई खुद को खेल मंत्रालय के अन्तर्गत रजिस्टर कराये. हाल ही में हम सभी ने यह अच्छी तरह देख परख लिया है कि खेलों को रेगुलेट करने में सरकार कितनी सक्षम है. कामनवेल्थ खेलों मे सभी ने सरकार की रेगुलेशन पावर को काफी करीब के देखा है. यह भी देखा है कि खेल तो खेल सरकार सीबीआई को भी रेगुलेट कर लेती है. बस नही कर पाती है तो भ्रस्टाचार को, मंहगाई को, गरीबी को, बेरोजगारी को और काले धन को. आश्चर्य़ की बात है कि अच्छी तरह चल रहे क्रिकेट बोर्ड को सरकार रेगुलेट करना चाहती है. बीसीसीआई अपने आप में एक स्वायत्त संस्था है जो अपने खिलाड़ियों के वेलफेयर का पूरा ख्याल रखती है. इसी संस्था ने क्रिकेट को फर्श से अर्श पर ला कर खड़ा किया. धोनी और पठान जैसे खिलाड़ियों को छोटे शहरो से लाकर स्टार बना दिया. आज बीसीसीआई की बनाई यही क्रिकेट टीम दुनिया की नंबर 1 टीम मानी जाती है. इसे बीसीसीआई का मैनेजमेंट ही कहना चाहिये कि आईसीसी में इंडिया की तूती बोलती है. अब जब इस तरह की कोई संस्था सुचारू रुप से खेल को नये आयामों तक ले जाने में सक्षम हो गई है तो मंत्रियों, अफसरों और उनकी बीबियों को बीसीसीआई मोटी मुर्गी की तरह नजर आने लगी है जिसके हांथ लगते ही उन्हे मुफ्त विदेशी ट्रिपें और फ्री पार्टियां आसानी से मिलने लगेंगी. समझ नही आता कि सुरेश कलमाड़ी जैसे किसी रेगुलेटर को लगा कर सरकार क्या रेगुलेट कर लेगी?

Tuesday, January 18, 2011

सांप ने रोकी ट्रेनों की रफ्तार

शुक्लागंज, अ.प्र : गंगाघाट स्टेशन के पूर्वी केबिन के पास लेवर पाइप में सांप फंस जाने से सिग्नल लोड नहीं हो सके। जिससे एक घंटे तक अप व डाउन ट्रैक पर ट्रेनों का आवागमन ठप रहा। सिग्नल न मिलने से विभिन्न ट्रेनों को गंगाघाट, मगरवारा व उन्नाव स्टेशनों पर रोक दिया गया। उधर रेलवे कर्मचारी सांप को हटाने के लिये घंटों मशक्कत करते रहे। काफी देर बाद एक सपेरे को बुलाया गया। सपेरे ने काफी देर बाद सांप को पकड़ा। जिसके बाद सिग्नल लोड हुये और ट्रेनों का आवागमन शुरू हो पाया।

गुरुवार दोपहर करीब 3 बजे लखनऊ से राप्ती सागर सुपर फास्ट एक्सप्रेस के आने की सूचना मिलते ही कंट्रोल रूम कर्मचारी ने सिग्नल डाउन करने का प्रयास किया लेकिन सिग्नल डाउन नहीं हुये। वहीं सिग्नल न मिलने से चालक ने ट्रेन को गंगाघाट में ही रोक दिया। उधर पीछे आ रही गरीब रथ एक्सप्रेस को मगरवारा और लखनऊ से कानपुर जा रही 9 एलकेएम को उन्नाव जंक्शन में खड़ा कर दिया गया। इसके अलावा अप लाइन की गाड़ियों को कानपुर आउटर में रोक दिया गया। कर्मचारियों ने पुल पर जाकर देखा तो सिग्नल लोड करने वाले लेवर पाइप में एक सांप फंसा हुआ दिखा। यह देख कर्मचारियों के हाथ पांव फूल गये। कर्मचारियों ने अपने स्तर से सांप को लेवर पाइप से भगाने का काफी प्रयास किया लेकिन कामयाब नहीं हो पाये। हारकर कर्मचारियों ने उच्चाधिकारियों को सूचना दी। बाद में उच्चाधिकारियों ने एक सपेरे को बुलाया। सपेरे ने काफी मशक्कत के बाद सांप को अपने कब्जे में ले लिया। सेक्शन इंजीनियर संकेत एसएच खान ने बताया कि सांप फंस जाने से सिग्नल लोड नहीं हो पाये और एक घंटे तक ट्रेनों का आवागमन ठप रहा। बाद में सपेरे को बुलाकर सांप को पकड़वाया गया। इसके बाद ही ट्रेनों का संचालन शुरु हो पाया।

एक घंटे तक थमे रहे ट्रेनों के पहिये, यात्री बेहाल

उन्नाव : दोनों तरफ से एक घंटे तक ट्रेनों का आवागमन ठप रहने से ट्रेन यात्री खासे बेहाल रहे। वहीं ट्रेनों का संचालन प्रभावित रहा। सबसे ज्यादा परेशानी दैनिक यात्रियों को उठानी पड़ी। उन्नाव जंक्शन पर लखनऊ से कानपुर जा रही 9 एलकेएम पहुंची और करीब 1 घंटे तक खड़ी रही। जब काफी देर बाद भी ट्रेन नहीं चली तो यात्रियों की भारी भीड़ चालक के केबिन के पास पहुंच गई। यात्रियों ने चालक से पूछा तो उसने सिग्नल न मिलने की जानकारी दी। चालक पूरी सूचना न दे सका। इस पर यात्री कंट्रोल रूम में पहुंच गये। वहां पर उन्हें मामले की जानकारी हो पाई। हार कर यात्री वापस गाड़ी में आकर बैठ गये। यही स्थिति मगरवारा में खड़ी गरीब रथ एक्सप्रेस के यात्रियों की रही। वातानुकूलित गरीब रथ ट्रेन लखनऊ के बाद सीधे कानपुर में ही रुकती है। लेकिन बीच में काफी देर रुकने के कारण यात्री आगे किसी हादसे की आशंका सोचकर दहशत में आ गये। किसी तरह से डिब्बे से बाहर निकलकर पूछताछ की तो सांप फंसने की जानकारी हुई। वहीं गंगाघाट स्टेशन पर खड़ी राप्ती सागर के यात्रियों को जब सांप फंसने की सूचना मिली तो अधिकांश लोग उतरकर पैदल ही पुल पर पहुंच गये। पुल पर यात्रियों का भारी मजमा लगा रहा। ट्रेनों के लेट हो जाने से यात्री भी खासे परेशान रहे। जब सपेरे ने सांप को पकड़ लिया और ट्रेनों का आवागमन सामान्य हो पाया इसके बाद यात्रियों ने राहत की सांस ली।

Tuesday, January 11, 2011

कौन है बालीवुड का असली राजकुमार ?




हमारे अभिन्न और अनन्य मित्र असीम का यह आर्टिकल मै यहां साभार प्रकाशित कर रहा हूं:-





नो वन किल्ड जेसिका से अचानक एक राज कुमार चर्चा में आ गए हैं॥ ये हैं बालीवुड निर्देशकों की युवा पीढी के एक और जुझारू सदस्य राज कुमार गुप्ता। इस नाम के ज़ेहन में आते ही दो और नाम कौंधते हैं... राज कुमार संतोषी और राज कुमार हिरानी और अचानक ही अवचेतन मन इन तीनों को कम्पेयर करने में लग जाता है. जो पहली बात दिमाग में आती है वो ये है कि राज कुमार गुप्ता नाम के प्रभाव के मामले में बाकि दोनों राज कुमारों से पिछड़ जाते हैं. क्यूकी शायद उत्तर भारतीय होने के कारन उनका नाम बड़ा ही फेमिलिअर सा लगता है बड़ा आम सा लगता है. पर जब हम क्वालिटी को परखते हैं तो ये फेमिलिअर सा नाम राज कुमार संतोषी और राज कुमार हिरानी से उन्नीस नहीं बैठता. खैर जहा तक तीनो की तुलना का प्रश्न है तो देखते हैं कि इन तीनों के नाम में ही सिमिलरटी है या काम में भी और वो कौन है जिसे बालीवुड का असली राजकुमार कहा जा सकता है.....

राज कुमार संतोषी इन तीनों में सबसे ज्यादा पुराने हैं और सबसे ज्यादा नाटकीय भी। नब्बे के दशक में गोविन्द निहलानी के असिस्टंट के रूप में काम शुरू करने वाले राज कुमार संतोषी ने घायल फिल्म के साथ निर्देशन की दुनिया में कदम रखा. पहली ही फिल्म को सात फिल्म फेयर अवार्ड मिले फिर दामिनी, घातक, पुकार, लज्जा, लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह, खाकी और हल्लाबोल पर बाक्स ऑफिस और एवार्ड शोज़ दोनों ही मेहरबान रहे. और कुछ दिन पहले अपने स्वाद से काफी अलग अज़ब प्रेम की गज़ब कहानी बनाकर फिर सफलता और चर्चा में रहे. कुल मिलाकर उन्होंने बालीवुड के ट्रेंड से जादा छेड़छाड़ ना करते हुए उसमे फ्रस्ट्रेशन और एंगर का तड़का लगाया और ढेर सारी नाटकीयता का मसाला झोंककर हमेशा एक स्वादिष्ट और हिट डिश तैयार करते रहे. लम्बे समय तक काम करना और हिट रहना बताता है कि नयी हवा का रुख भांपकर अपनी डिश के मसाले में ज़रूरी बदलाव करना भी उन्हें अच्छी तरह आता है. जिससे उनकी रेसिपी हमेशा एवरग्रीन बनी रहती है.

अब बात करते हैं राज कुमार हिरानी की, २००३ में मुन्ना भाई एमबीबीएस के साथ अपना निर्देशकीय कैरियर शुरू करने वाले राजकुमार हिरानी भले ही उतने पुराने ना हों, पर सफलता के मामले में असली राजकुमार यही हैं। और इसका क्रेडिट काफी हद तक उनकी कलम को भी जाता है. ऐसा अभी तक नहीं हुआ कि राज कुमार हिरानी फिल्म बनाएं और उसे बेस्ट स्क्रीनप्ले के लिए एवार्ड्स ना मिलें. थ्री इदिअट्स का 'चमत्कार और बलात्कार' वाला सीन इस टैलेंट का ताज़ा उदाहरण है कि वो डायलाग्स से स्पेशल इफेक्ट डालने में कितने माहिर हैं. नाटकीयता के मामले में राज कुमार संतोषी की बराबरी तो नहीं करते पर उनसे ज्यादा पीछे भी नहीं हैं शायद इसीलिये उन्हें क्रिटिक्स का साथ एक हद तक ही मिल पाता है. उनकी मूवीस के सब्जेक्ट्स में एक बड़ी सिमिलार्टी है कि उन्होंने अपने प्लाट्स हमेशा बर्निंग ईस्यूस से ही उठाये हैं. मुन्ना भाई एमबीबीएस में फ्रस्ट्रेशन, लगे रहो मुन्नाभाई में करप्शन और ३ ईडीयट्स में हमारे एजूकेशनल सिस्टम की कुछ बड़ी कमियों को टार्गेट किया है. और यही बात राज कुमार गुप्ता के काम में भी दिखाई पड़ती है. पर ईस्यूज़ के साथ दोनों के ट्रीटमेंट्स में काफी अंतर है.

राज कुमार हिरानी की अप्रोच जादा जनरल है जिससे उनके काम के लम्बे समय तक रिलेवेंट रहने की आशा की जा सकती है। जबकि राजकुमार गुप्ता के साथ ऐसा नहीं है. शायद इसीलिए आमिर से ही नोटिस में आ जाने पर भी नो वन किल्ड जेसिका से उनका नाम नए सिरे से ज़ेहन में आता मालूम होता है. पर गौर करने वाली बात ये है कि उन्हें दर्शकों को बांधके रखने के लिए राज कुमार हिरानी की तरह हलके फुल्के हँसी मज़ाक की मदद नहीं लेनी पड़ती. उनकी कसी हुयी स्क्रिप्ट ही दर्शकों को एंगेज रखने के लिए काफी होती है. एक बहुत बड़ा फर्क ये है कि उन्हें राज कुमार संतोषी और राज कुमार हिरानी की तरह बड़े स्टार्स की मदद नहीं लेनी पड़ती वो कहानी और कैरेक्टर के बलपर फिल्म को हिट करना जानते हैं. और अब बात करते हैं राज कुमार गुप्ता की सबसे बड़ी खासियत की. राज कुमार गुप्ता के काम में नाटकीयता के दर्शन बस नाम मात्र को ही होते हैं जबकि संतोषी और हिरानी बिना लटके झटकों के फिल्म बनाने की सोच भी नहीं सकते. राज कुमार गुप्ता जिन सब्जेक्ट्स पर काम करते हैं उनमे नाटकीयता को दूर रखना जितना ज़रूरी है उतना ही मुश्किल भी. इसलिए निश्चित रूप से राज कुमार गुप्ता का काम क्रिटिक्स की नज़र में भी उतना ही दमदार है जितना कि आम दर्शक की नज़र में.

अब बात करते हैं फ्यूचर की, क्यूकी असली राज कुमार तो वही है भविष्य का राजा हो. ज़रा सोचिये बुद्धिजीवियों की दिन पे दिन बढ़ती संख्या को देखते हुए ये तो साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि राज कुमार संतोषी की शैली अब ज्यादा दिन नहीं टिकने वाली क्योकि नए ज़माने की हवा को पढना अलग बात है और नए ज़माने का होना एक अलग बात है. अब ऐसे में मुकाबला बचता है हिरानी और गुप्ता के बीच में, जहा तक मै समझता हूँ निकट भविष्य में भले ही राजकुमार हिरानी का पलड़ा भारी नज़र आये पर आखिरकार राज़ कुमार गुप्ता का ही समय आना है.. जब फिल्में किसी ड्रीमलैंड की सैर करने की बजाये हमारे मोहल्ले की गन्दगी दिखाएंगी और कोई गंभीर बात कहने के लिए हलके फुल्के मनोरंजक चुटकुलों की ज़रुरत नहीं पड़ेगी. इसलिए मै तो मानता हूँ कि इन तीनों में राज कुमार गुप्ता ही बालीवुड के असली राज कुमार हैं. आप क्या सोचते हैं....?

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