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Saturday, February 19, 2011

टुनिशिया, मिस्र और यमन, अल्जीरिया के आगे पार्ट-2...लीबिया, बहरीन, तुर्की और जार्डन

उत्तर भारत के गावों में एक कहावत कही जाती है- "बुढ़िया के मरने का डर नहीं है, डर तो इस बात का है कि यम परक # जायेंगे' . टुनिशिया, और मिस्र की क्रांतियों से लगता है मानो  अफ्रीका में यम परक गए हो !
 यमन में अठारह दिनों तक चले संघर्ष के बाद जिस तरह से मोनार्ची का अंत हुआ है उससे समूचे अफ्रीका में भूचाल आ गया है. पड़ोसी देशों में भी इस बात को लेकर ये आशा जगी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से तख्ता पलट किया जा सकता है . प्रदर्शनों की जो शुरूआत पिछले दिनों यमन और अल्जीरिया से हुई वो भले ही तत्काल कोई असर नहीं छोड़ पायी मगर उसका असर अब बहरीन, लीबिया, जार्डन और तुर्की में देखने को मिल रहा है.
 पिछले तीन दिनों में ही तुर्की में लगभग सौ लोगों की मौत हो चुकी है और प्रदर्शन तेज होता जा रहा है. बहरीन में भी परिस्थितियाँ बेकाबू है जहाँ शुक्रवार को नमाज के बाद लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा और सेना को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. यमन में पहले ही दबाव में आकर 30 सालों से सत्ता में बैठे  प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला सालेह ने २०१३ में गद्दी छोड़ देना का ऐलान कर दिया है . जार्डन में भी राष्ट्रपति शाह अब्दुल्ला द्वितीय की शक्तियों को सीमित करने की मांग जोरों से उठ रही है. तुर्की में देशद्रोह के आरोपों में उम्रकैद की सजा झेल रहे अब्दुल्ला की रिहाई की मांग जोर पकडती जा रही है . यही हाल लीबिया का भी है. वहां कर्नल मोहम्मद गद्दाफी की ४० सालों की हुकूमत से लोग त्रस्त आ गए हैं.





 ट्यूनीशिया में मरी बुढ़िया से सारे अफ्रीका में यमों की आवाजाही तेज हो गयी है , देखना होगा कि अरब में कितनी बुढ़िया मरती हैं और यम अफ्रीका से रास्ता बदल कर इरान, अफगानिस्तान और पकिस्तान होते हुए चाइना तक पहुँचते है या नहीं ?




आलोक दीक्षित 
07499219770
09651411891
# ( Its not the matter that Grand mother died, the matter is that Yamraj will know this place).

Saturday, February 12, 2011

टुनिशिया, मिस्र और यमन, अल्जीरिया




कल मिस्र में मुबारक के गद्दी छोड़ देने के बाद और पडोसी अफ्रीकी देशों में अचानक आयी क्रान्तियों के बाद देश दुनिया में लगातार यह कयास लग रहे हैं कि अफ्रीका में एक बड़ा बदलाव आयेगा. हाल ही में जिन बदलावों की बात की जा रही है वे हैं यमन और अल्जीरिया. जैसे ही मिस्र में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक नें गद्दी छोड़ने का ऐलान किया पड़ोसी देश अल्जीरिया में लोग सड़कों पर उतरने लगे. लगता है मिस्र में मुबारक के तख्तापलट के बाद लोकतंत्र की मांग का वायरल पूरे अफ्रीका में तेजी से फैलेगा.
यमन की राजधानी सना में कुछ दिनों पहले बुधवार के दिन जिस तरह विपक्षी पार्टियों ने विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया था और हड़बड़ी में प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला सालेह ने 2013 में बिना किसी उत्तराधिकार के गद्दी छोड़ने का ऐलान कर दिया था उससे देश दुनिया को यह लगने लगा कि मिस्र के बाद अब यमन ही स्वतंत्रता पाने वाला अगला देश होगा. मगर अगर अफ्रीका के इतिहास पर गौर करें तो यह साफ समझ आ जायेगा कि यमन की मुसीबतें कम नहीं हैं. यमन अफ्रीका के सबसे गरीब देशों में से एक है और प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला की जड़ें वहां काफी मजबूत बताई जातीं हैं. वैसे इसका एक उदाहरण बुधवार के बाद हुये प्रदर्शन में भी मिला जब 40 हजार की भीड़ सना यूनिवर्सिटी पर एकत्र हुयी मगर वहां न तो कोई गर्मागर्मी हुयी और न कोई बड़ी मांग. फिलहाल अल्जीरिया के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं. लोकतंत्र की मांग वहां भी रहरह कर उठती रही है. मगर हरबार राष्ट्रपति अब्दल अज़ीज़ बूतेफ्लिका की तानाशही अब तक के किसी भी प्रदर्शन पर भारी ही पड़ी है. मिस्र के घटनाक्रम से उत्साहित आज़ादी के समर्थकों नें जब एक विशाल रैली करने का फैसला किया तो राजधानी अल्जीयर्स में लोकतंत्र के समर्थन में होने वाली इस रैली पर प्रतिबंध लगा दिया गया. अल्जीयर्स में भारी मात्रा में पुलिस बल की तैनाती के कारण कोई भी बड़ा विरोध देखने को नहीं मिला और मिस्र की गर्म हवा का सीधा असर अल्जीरिया और यमन पर नहीं नहीं पड़ पाया. आजादी की इस आवाज को दबा दिया गया.
इतिहास गवाह है कि आन्दोलनों को शुरूआत में हमेशा ही दबाया गया है. इससे पहले भी टुनिशिया और मिस्र जैसे आंदोलनों की शुरुआत को रोकने के लिए जो कुछ किया गया वह किसी से छिपा नहीं है. दुनिया के अधिकतर देशों में परिवर्तन बड़ी मुश्किलों के बाद ही आया है. अफ्रीकी परिस्थितियों को देखते हुये सम्भव है कि क्रान्ति आने में कुछ देर लग जाय मगर यह तो तय है कि लोकतंत्र का बीज अफ्रीका में अंकुरित हो चुका है .

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