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Monday, April 4, 2011

Where is Poonam Pandey?

India won the worldcup. You and I are over with parties. Heat of victory slowly came down. Now it’s another heat which is up. Everybody is searching Poonam Pandey. Do you know where Poonam Pandey is?  


The svelte beauty, who declared that she would go nude if India wins has now disappeared from her residence.  We tried her mobile several times. It has been switched off since the match got over.


Sources say Poonam wrote to BCCI that she was serious about baring it all for the boys. According to Poonam it would be a therapeutic method to boost and inspire people to perform better in any field.

Poonam firmly said when she asked if it’s only a publicity stunt, “I am doing this to excite the Indian players to play better, and not for her own publicity”.

What public says on it?

“The missing beauty is now disappointing many of us,” says Vishal, a physician from Mumbai. He further says, “Poonam is not keeping up her promise”.

Imran Mohhamad tweets, “At least she is using her own 'resources' to thank cricketers, not like Netas frittering Taxpayers money”.

A fan even goes further saying he has bought HD TV to see Poonam nude.

Everybody is searching for Poonam now.  Immediately after the match was over, there were several Facebook wall posts like, “Where is Poonam?”, “I’m waiting for you Poonam”,

Here are few posts and tweets about Poonam Pandey
-

Ritesh :- Where the hell is Poonam Pandey

Anil :- Vaada kiya to nibhao. Dikhao.

Hamid Khan:- Fantastic win India , have a fantastic party , as world champions you deserve this!

M Sudan:- R U ALRIGHT....tell me...really ..its nt about making ur carrier..frm this nude hoax...??? u want publicity...huh.

Sitanshu Srivastava:- Don’t u thnk whether u strip or u dnt, the world cup has to be in india,.. The GOD of Cricket is there to get it.

Souvikk:- Everyone should take a publicity lesson frm u.dnt prove urself 2 b a prossssss.


Alok Dixit
Journalist 
(This article is first published in I-Next Live)

Sunday, March 27, 2011

Does ‘Netaji’ not eat Ice-cream?


A report published in DARE says that India has a low per capita ice cream consumption of 300 ml per annum. According to the report the trend is slowly changing due to a number of reasons. I thought why shouldn’t I find out how often politicians in India eat ice-cream. Believe me, I found none.



We used Google search to get pictures of Indian politicians but every time Mr. Obama teased us with his choppy choppy images. We found Michelle Obama chumming with her son and daughter and flavoring Vanilla on the roadside. I should say Obama family tops the list of Ice-cream lover politicians.


Apart from Obama I saw Joe Biden bantered with his manager at Kopp's Frozen Custard. Mr. Bush was maintaining an aura of grace and poise at all times with an ice-cream in his hand. In one of such pictures Prime Minister of Italy Mr. Silvio Berlusconi looks like a creep with ice cream.


I didn’t stop here. I was worried about our country, India and more of politicians. I searched for few site exclusively running information regarding politicians eating ice-creams. It’s a matter of great surprise, I found few.


A site www.politicianseatingicecream.tumblr.com  is a dedicated site serving information on politicians who eat ice creams in public. www.huffingtonpost.com  serves 45 exclusive pictures of politicians with a ice-cream cone in their hands.


Though we couldn’t find any Indian Uncle at the end (maybe Obama eat all of it). But no worries, I stole few pictures for you, thought you would definitely like it.





(This article is first published in I-Next Live website)

Alok Dixit
Journalist
Dainik Jagran


Sunday, March 20, 2011

राह का रोड़ा


राह का रोड़ा,
टकराता है कई क़दमों से,
और  बढ़ जाता है आगे,
उन अनगिनत ठोकरों से.
मीलों चला जाता है सिर्फ ठोकरें खाकर
और फिर आ जाता है
किसी पथिक के नीचे,

या कर देता है जख्मी
राह के किसी राही को.

कई वाहनों को एक पल में तबाह कर देता है
और ले लेता है बदला उन्लाखों ठोकरों का


मगर जब वही रोड़ा
दिखता है किसी शिल्पी को
तो ले आता है वो उसे अपने साथ
और दे देता है उस रोड़े को,
एक ऐसा रूप, जो साकार करता है सपने
लाखों मनुष्यों के
और ख़त्म कर देता है उस सिलसिले को
जो ना जाने कब से चला आ रहा था
भगवान् सा यह रोड़ा बिन वजह ही सबको सता रहा था

Tuesday, February 22, 2011

आखिरी अलविदा


मच्छरों के दल में उस दिन एक खुशी की लहर दौड़ी जिस दिन मच्छरों की केमिकल लैबोरेटरी ने एक ऐसा रसायन तैयार कर लिया जिससे जानसन की मौत तय थी। मच्छरों के प्रधानमंत्री मास्कू ने इस रसायन को खुद ही जानसन के शरीर में पहुंचाने का जिम्मा लिया।
           आमतौर पर जैसा होता है कि आदमी को मच्छर अपना दुश्मन समझता है, बिल्कुल वैसा यहां पर नहीं था। कुछ मच्छर उस इंसान को अपना दोस्त भी मान लेते, मगर यहां बात उनकी जिन्दगी की आ गई थी। वैसे आमतौर पर नर मच्छरों को इनसे कोई मतलब नहीं होता है। नर मच्छर तो केवल फूल पत्तियों के रस से जीवन निर्वाह कर लेते हैं।मानव जाति के किये गये किसी भी बड़े उलटफेर से उनका वास्ता बहुत कम बार ही पड़ता है। मगर इस बार मिस्टर जानसन के खिलाफ सारे मच्छर एकजुट थे। मिस्टर जानसन (मच्छरों के लिए सिर्फ जानसन), के खून में एक अजीब सा रसायन था। उनको जिस मच्छर ने काटा वह तुरन्त मौत के घाट उतर गया। छुटपन से ही जानसन ने यह रसायन सक्रिय हो गया था और यही कारण था कि जानसन का नाम मच्छर बिरादारी में बड़ी घृणा के साथ लिया जाता था। जानसन को सबक सिखाने के लिए न जाने कितने क्रांतिकारी मच्छर शहीद हो गये थे और न जाने कितने ही सक्रिय थे। उनकी मीडिया में आये दिन जानसन से सम्बन्धित लेख और सम्पादकीय निकलती रहती थी। उनमें जानसन को मच्छर जाति का विरोधी, क्रूर, सीरियल किलर और इस तरह की कई उपाधियों से नवाजा जाता और इसको पढ़ लेने के बाद नये मच्छरों का खून उबल जाता। प्रौढ़ मच्छर पहले से ज्यादा सतर्क हो गये थे और यही कारण था कि कुछ क्रान्तिकारी और सुसाइड केस मच्छरों को छोड़ कोई भी मच्छर मिस्टर जानसन के इर्द गिर्द नहीं घूमता था।


image by:- art365.joeuser.com

    मिस्टर जानसन बिल्कुल वैसे नहीं थे जैसा कि मच्छरों के साहित्य में वर्णित था। वे तो बेहद ही नेकदिल और अहिंसा परस्त व्यक्ति थे। जब से उन्हें यह बात मालूम पड़ी थी कि उनका खून मच्छरों के लिए मौत का पैगाम लेकर आया है वे खुद को अधिक ढ़का हुआ रखते थे। दिन में लम्बा सा ओवरकोट पहनते थे। गले का कालर भी उठाकर रखते थे और ज्यादातर सिर ढका रखते थे। उन्हें अपनी इस असाधारणता पर दुख भी होता था और इसके लिए वह तरह-तरह के इलाज भी करा चुके थे। वह लगातार ऐसा करते रहे और तब तक किया जब तक कि उनको दवाईयों से इफेंक्शन नहीं हो गया। अब खुद को बचाकर रखना ही उसका उपाय था और वह अक्सर ऐसा ही करते थे। वे तब बहुत दुखी हो जाया करते जबकि इतने बचाव के बाद भी कोई न कोई मच्छर मर जाता। रात में वह मच्छरदानी लगाते थे और प्रयास करते कि कोई मच्छर उन्हें काटने न पाये।
    इधर मच्छरों का क्रोध जानसन पर दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा था। मच्छरों को यह विश्वास हो चला था कि जानसन मच्छर जाति को खत्म कर देना चाहता है। अब तक मच्छरों के कई बड़े और कर्मठ नेता भी मिस्टर जानसन का शिकार हो चुके थे और मच्छरो ने जानसन को ठिकाने लगाने की अपनी योजना पर काम भी शुरू कर दिया था। मच्छरों के दल में उस दिन एक खुशी की लहर दौड़ी जिस दिन मच्छरों की केमिकल लैबोरेटरी ने एक ऐसा रसायन तैयार कर लिया जिससे जानसन की मौत तय थी। मच्छरों के प्रधानमंत्री मास्कू ने इस रसायन को खुद ही जानसन के शरीर में पहुंचाने का जिम्मा लिया। मगर यह खुशी तब शोक में बदल गयी जब उस रसायन को पीते ही प्रधानमंत्री मास्कू की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। जनता ने लैबोरेट्री पर पथराव कर उसे बन्द कर दिया और जानसन पर किया जा रहा शोध रोक देना पड़ा। प्रधानमंत्री की मौत से मच्छर समुदाय का खून उबल पड़ा। जानसन बच्चों का भी बिलेन बन गया। जानसन पर कई बड़ी फिल्में सुपरहिट रहीं जिनमें मशहूर विलेन जिमी, टाफू और सिनी ने जानसन का रोल किया। मच्छरों के बीच आये दिन जानसन का पुतला फूंका जाता और धरना प्रदर्शन होता। सरकार पर लगातार जानसन को मारने का दबाव बढ़ता जा रहा था। विपक्ष के हंगामें का एकमात्र विषय जानसन बन गया था।
इसी बीच अखबारों में एक अफ्रीकन मच्छर लिली के आने के खबर प्रकाशित हुई। इस स्टिंग आपरेशन के बाद पुलिस का ध्यान लिली पर पड़ा और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अगने दिन की कोर्ट कार्यवाही के बाद उसे रिमाण्ड पर ले लिया गया। लिली से पुलिस ने कड़ी पूछतांछ की और पाया कि लिली अफ्रीकी देश जारा से आई है। उसकी लम्बी यात्रा का कारण उसकी एक असाधारण ताकत है। लिली को तुरन्त सरकार की कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। कैबिनेट ने बातचीत के बाद लिली को इस शर्त पर छोड़ना चाहा कि वह मिस्टर जानसन को मारे। लिली ने जानसन वाली बात मानने से इंकार कर दिया। लिली पर जासूसी का मुकद्मा चलाया गया और जैसा कि मच्छर कानून में जासूसी के लिए मृत्युदण्ड वर्णित था लिली को दिया गया। अब अगले दिन लिली को मौत लगे लगाना ही था।
    सरकार इस मौके को जाने देना नहीं चाहती थी इसलिए तत्कालीन मच्छर प्रधानमंत्री राना जेन स्वयं उससे मिलने पहुंचे। प्रधानमंत्री को देखते ही लिली ने झुककर सलाम किया। प्रधानमंत्री ने उसे बताया कि अगर वह जानसन वाली बात मान ले तो उसकी सजा माफ हो सकती है और वह इनाम की हकदार भी हो सकती है। मगर लिली अपनी जान बचाने के लिए किसी निर्दोष की हत्या करने को तैयार नहीं थी। उसे जब यह मालूम पड़ा कि जानसन एक हत्यारा है तो उसने अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने का मन बना लिया।
    मच्छर समुदाय के बच्चे-बच्चे तक यह बात पहुंच गई कि अब जानसन की मौत तय है और सभी इस बार पहले से कहीं अधिक सतर्क दिखाई दे रहे थे। लिली को रिहा कर दिया गया और उसे इस काम के लिए एक महीने का समय दिया गया। जानसन इन बातों से बिल्कुल बेखबर था और अपनी दैनिक दिनचर्या को व्यवस्थित बनाता हुआ जी रहा था। सुबह से शाम तक अपने शरीर को ढके रखने में ही उसका ध्यान रहता था और इसी वजह से लिली को काम को अंजाम देने का मौका नहीं मिल पाया था। एक दिन मिस्टर जानसन अपनी मच्छरदानी में आराम से लेटे हुए थे और नींद लेने के करीब पहुंचे ही थे कि एक मच्छर की गूंज उनके कानों में सुनाई दी। वह झटके से दूर हो गये और उस मच्छर से न काटने का आग्रह किया। लिली ने बताया कि वह कई दिनों की भूखी है और वह उसे काटकर अपना पेट भरना चाहती है। जानसन ने हंसते हुए बताया कि ऐसे तो वह अपना पेट फाड़ लेगी और मौत को गले लगा लेगी। जानसन ने लिली को भोजन दिया और बाद में कुछ फलों का रस और बियर का आनन्द भी।  उस दिन लिली ने भरपेट खाना खाया। खाने के बाद लिली ने जानसन को काटने का मन बदल दिया। लिली ने जानसन को कई सारे गाने सुनाये और जानसन ने भी लिली को दुनिया की तमाम अजीब दस्तानें बतायीं। फिर दोनों ने अपनी-अपनी यात्राओं का बढ़ा-चढ़ा कर रोचक ढंग से वर्णन किया और वे अच्छे दोस्त बन गये। अब लिली और जानसन अधिकतर मिल लिया करते। जानसन जब भी आफिस जाता लिली भी उसके साथ होती। अक्सर ठण्ड में वह उसके ओवरकोट में छिपी रहती और फुर्सत मिलते ही बाहर निकलकर जानसन से बातें करती। कुछ ही दिनों में जानसन और लिली एक दूसरे की जिन्दगी का हिस्सा बन गये। अगर जानसन कभी बीमार पड़ जाता तो लिली उसका ख्याल रखती और जानसन भी लिली को उतना ही चाहता। जानसन तो कुछ दिनों में ही सही हो गया मगर लिली इस बीच कुछ परेशान रहा करती। उस पर आये दिन दबाव बढ़ता जा रहा था। कैबिनेट ने उसे कई बार दफ्तर तलब किया और मंत्रालय लगातार उस पर निगरानी बनाये हुये था। मीडिया भी लिली को लेकर तमाम अटकलें लगा रहा था। इधर कई दिनों से तंग आकर लिली ने अखबार पढ़ना छोड़ दिया था। वह उदास रहा करती थी। जानसन के पूछने पर वह हर बात को टाल जाती। जानसन इस उदासी के बीच लिली को खुश करने की भरपूर कोशिश करता मगर लिली और दुखी हो जाती। वह बस इतना कहती कि वे ज्यादा दिनों तक साथ नहीं रह सकते। जानसन यह सुनकर दुखी हो जाता और सोचता कि लिली को ऐसा क्यूं लगता है। लिली पर वह कभी दबाव नहीं बना पाता और लिली हमेशा उसकी इस बात को टाल जाती। अब लिली के पास एक दिन और था। लिली ने यह बात जानसन को बताई। जानसन ने लिली को सबसे अच्छे होटल का खाना खिलाया, दोनों ने साथ-साथ शराब पी और जानसन ने अपनी सबसे पहली वाली प्रेयसी के बारे में लिली को बताया। उसने यह भी बताया कि वह लिली को कितना प्यार करता है। अगले दिन की सुबह लिली जल्दी उठ गई। उसने जानसन को आखिरी गुड मार्निंग कहीं और बताया कि इसके बाद कोई लिली उसे गुड मार्निंग नहीं कहेगी। लिली और जानसन ने मिलकर आंसू बहाये और फिर लिली ने जानसन को काट लिया। जानसन को इस बात का पता नहीं चल पाया। उसे लिली से आग्रह किया कि वह उसे यह बताये कि वे आखिर क्यूं नहीं मिल सकते।
    लिली पूरी तरह टूट चुकी थी। उसने जानसन से कहा कि वह उसे माफ कर दे। अगले पांच मिनट बाद वे एक दूसरे से जुदा हो जायेंगे। उसने बताया कि वह एक अद्भुद शक्ति की मालिका है। वह जिस भी इंसान को काट लेती है, उसकी कुछ मिनटों में ही मौत हो जाती है। फिर वह इंसान केवल इसी शर्त पर बच सकता है कि लिली उसे दोबारा काटे। उसने बताया कि अफ्रीका में उसने कई लोगों का काटा था। उसे ऐसा नहीं मालूम था और लोगों की जाने लगतार जा रही थीं। मनुष्यों का जब इस बात का पता चला तो वह मच्छर जाति से घृणा करने लगे। वहां मनुष्यों ने बड़े स्तर पर मच्छरों का विनाश कर डाला। कई करोड़ मच्छर मारे गये और समूची मच्छर जाति पर संकट आ गया। उसे अफ्रीका छोड़ देना पड़ और वह यहां आ गई।
    जानसन इस बात को बड़ी गम्भीरता से सुन रहा था और यह समझने की कोशिश कर रहा था कि इन बातों का लिली के जाने से क्या सम्बन्ध है। क्या अफ्रीकी मच्छरों ने उसे वापस बुला लिया है या लिली अपने परिवार से मिलने के लिए जबरन अफ्रीका में घुसना चाहती है। तभी लिली की एक बात ने उसका ध्यान भंग कर दिया। उसने बताया कि वह उसे काट चुकी है। जानसन यह सुनकर डर गया। उसे लाग कि उसका सिर घूम रहा है और उसके सामने अंधेरा छा गया। उसको अपनी दोस्ती की इतनी भयानक सजा मिलने वाली थी उसने नहीं सोचा था। उसको लिली पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह लिली को मार देना चाहता था। मगर उसके प्यार ने उसे ऐसा न करने पर मजबूर कर दिया था। लिली बोलती जा रही थी। वह कह रही थी कि वापस आने पर उसे पकड़ लिया गया और उसे मृत्युदण्ड हो गया। उसने बताया कि आज उसे मारने पर बहुत सारा इनाम मिलेगा। वह यहां की कैबिनेट में मंत्री बना दी जायेगी और सरकारी सुविधायें और ठाठ बाट उसे मुहैया हो जायेंगे।
    इतना बोलते-बोलते लिली गिर पड़ी। अब वह उड़ नही पा रही थी। जानस ने उसे हाथ पर उठा लिया। लिली ने जानसन के फीके चेहरे की ओर देखा और फिर मुस्कराई, ‘‘जानसन, मेरे प्यारे जानसन, यह सब मैंने मच्छरों की भलाई के लिए किया। मुझे माफ कर देना जानसन। वैसे एक बात बोलूं जानसन, मैंने तुम्हारा सारा जहर चूस लिया है। अब मच्छरों को तुमसे कोई खतरा नहीं है। दरअसल मैंने तुम्हें दोबारा काटा था। अब तुम एक आम आदमी हो जानसन। अलविदा, आखिरी अलविदा! दुनिया के सबसे प्यारे इंसान को लिली का आखिरी अलविदा।’’


By 
Alok Dixit

                                                                                                                                                                  
                                                                                      

Saturday, February 19, 2011

टुनिशिया, मिस्र और यमन, अल्जीरिया के आगे पार्ट-2...लीबिया, बहरीन, तुर्की और जार्डन

उत्तर भारत के गावों में एक कहावत कही जाती है- "बुढ़िया के मरने का डर नहीं है, डर तो इस बात का है कि यम परक # जायेंगे' . टुनिशिया, और मिस्र की क्रांतियों से लगता है मानो  अफ्रीका में यम परक गए हो !
 यमन में अठारह दिनों तक चले संघर्ष के बाद जिस तरह से मोनार्ची का अंत हुआ है उससे समूचे अफ्रीका में भूचाल आ गया है. पड़ोसी देशों में भी इस बात को लेकर ये आशा जगी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से तख्ता पलट किया जा सकता है . प्रदर्शनों की जो शुरूआत पिछले दिनों यमन और अल्जीरिया से हुई वो भले ही तत्काल कोई असर नहीं छोड़ पायी मगर उसका असर अब बहरीन, लीबिया, जार्डन और तुर्की में देखने को मिल रहा है.
 पिछले तीन दिनों में ही तुर्की में लगभग सौ लोगों की मौत हो चुकी है और प्रदर्शन तेज होता जा रहा है. बहरीन में भी परिस्थितियाँ बेकाबू है जहाँ शुक्रवार को नमाज के बाद लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा और सेना को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. यमन में पहले ही दबाव में आकर 30 सालों से सत्ता में बैठे  प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला सालेह ने २०१३ में गद्दी छोड़ देना का ऐलान कर दिया है . जार्डन में भी राष्ट्रपति शाह अब्दुल्ला द्वितीय की शक्तियों को सीमित करने की मांग जोरों से उठ रही है. तुर्की में देशद्रोह के आरोपों में उम्रकैद की सजा झेल रहे अब्दुल्ला की रिहाई की मांग जोर पकडती जा रही है . यही हाल लीबिया का भी है. वहां कर्नल मोहम्मद गद्दाफी की ४० सालों की हुकूमत से लोग त्रस्त आ गए हैं.





 ट्यूनीशिया में मरी बुढ़िया से सारे अफ्रीका में यमों की आवाजाही तेज हो गयी है , देखना होगा कि अरब में कितनी बुढ़िया मरती हैं और यम अफ्रीका से रास्ता बदल कर इरान, अफगानिस्तान और पकिस्तान होते हुए चाइना तक पहुँचते है या नहीं ?




आलोक दीक्षित 
07499219770
09651411891
# ( Its not the matter that Grand mother died, the matter is that Yamraj will know this place).

Thursday, February 17, 2011

आओ आपको एक कहानी सुनाता हूं..(जो सच्ची है और गन्दी है और बोरिंग है)

इसको मजे लेने के लिए ना पढ़ें, कहानी सोलहों आने सच है और इसलिए पूरी तरह बोरिंग है ..मै इसमें कनक्लुजन भी नहीं दूंगा 


सपने दो तरह के होते है . एक जो खुली आँखों से देखे जाते हैं और दूसरे जो आँखे बंद करके. इंडिया में हर लड़की बस एक ही सपना देखती है कि दुनिया कि सबसे ज्यादा खुशियाँ उसके पास हों और कोई सपनो  का राजकुमार आकर उसे दूर देश में कही वादियों के बीच ले जाये . हो सकता है कि आप एक लड़की हों और इस बात से इत्तेफाक ना रखती हों कि उज लड़की का बस यही सपना होता है.  मगर मै तो बस यह कर रह हूँ कि सपने सब देखते है, और कम से कम इत्याह तो तय ही है कि   कि दुनिया का कोई भी इंसान अबने बारे में बुरा नहीं सोंचता होगा. अब अगर यह सच है तो मै जिस लड़की कि कहानी सुना रह हूँ वो उन सपनों के एकदम उलट है . वो लड़की है आरती सरन.

आरती सरन भी बचपन से एक ही सपना लेकर बड़ी हो रही थी और वो था कि एमबीए करने के बाद वो ढेर सारा पैसा कमाएगी और फिर मायानगरी में जाकर फिल्मों में एक्टिंग के लिए ट्राई करेगी. वो सुन्दर थी और पड़ने में काफी तेज भी थी. उसके पिता प्रताप भी आरती को लेकर ढेर सारी उम्मीदें पाले बैठे थे क्यूंकि उनकी तीन बेटियों में आरती ही सबसे होनहार थी. मगर तभी आरती कि जिंदगी में एक तूफ़ान सा आ गया. उसके सपनो पर तेज़ाब पड़ गया. वो बुरी तरह झुलस गयी.उसका चेहरा जो अब तक बहुत सुन्दर था कुछ ही  मिनटों में दुनिया के सबसे खराब चेहरों से भी खराब चेहरा बन गया. राह चलते कुछ लड़कों ने उस पर तेज़ाब डाल दिया था. उसका चेहरा बुरी तरह झुलस गया और वो हमेशा हमेशा के लिए दुनिया की सबसे बदसूरत लड़की बन गयी.

हर केस की तरह यहाँ भी पुलिस ने मामले की रिपोर्ट दर्ज कर ली, मुख्य अभियुक्त अभिनव और उसके दो साथियों के खिलाफ पुलिस कि जांच शुरू हुई . अभिनव एक आयकर आयुक्त का बेटा था इसलिए लगातार जांच के पहलू बदलते रहे . पुलिस और प्रसाशन द्वारा अभिनव को बचाने की हर संभव कोशिस की गयी . लोकल मीडिया ने मामले को लगातार लाइमलाईट  में रखा और प्रशासन पर लागतार दबाव बनाए रखा . बावजूद इसके पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में ढेर सारी खामियां छोड़ दी जिससे अभियुक्त को हाईकोर्ट से सती मिल गया. अभिनव इस बीच लगातार बचता रहा और उसने पुणे से एमबीए कर किया और फिर अमेरिका जाकर जॉब करने लगा. इन्ही सब के बीच उसकी शादी भी हो गयी और वो एक खुशहाल जिन्दगी जीता रहा. दूसरी तरफ आरती और उसकी पिता इलाज के लिए हर जगह भटके. कानपुर से लखनऊ और फिर दिल्ली और इसके बाद मुंबई और फिर पुणे. प्रताप सरन हर जगह गए और हर कोशिश की कि उनकी बेटी को दर्द से कुछ राहत मिल सके. इस बीच उन्होंने अपनी पारिवारिक संपत्ति बेंच डाली, नौकरी से रिटायरमेंट ले लिया और कानपूर छोड़कर ग्वालयर  शिफ्ट हो गए. आये दिन अस्पतालों और कचहरी के चक्कर लगाते लगाते वे इतने परेशान हो गए कि उन्होंने आरती को न्याय मिलने की आशा ही छोड़ दी. घर से ही उन्होंने तमाम महिला संगठनों को लेटर लिखा, सोनिया गाँधी को लेटर लिखा और भारतीय महिला आयोग को भी लेटर लिखा . प्रताप बाते है कि, "एक समय तो हमने ये आशा ही छोड़ दी थी कि हमें न्याय भी मिल पायेगा. कानपुर में मेरा जीना ही दूभर हो गया था. आयेदिन हम पर समझौतों के तमाम दबाव पड़ रहे थे. जब मैंने इनकार कर दिया तो मुझे अलग अलग तरीकों से परेशान किया जाने लगा. आखिरकार हारकर मैंने कानपुर ही छोड़ दिया और ग्वालियर में अपने रिश्तेदारों के साथ रहने लगा."

कहानी बाद में लम्बी और बोरिंग होती गयी, वही न्याय के लिए भटकना, वही कोर्ट कचहरी के चक्कर, वही आपरेशंस, पहला वाला, दूसरा वाला, फिर तीसरा, फिर चौथा, फिर ना जाने कितने,और इन्सबके बीच आप्रेसंस के खर्चे. कहानी इतनी बोर हुई को लोगों को मजा आना बाद हो गया, लोगों ने सहानुभूति की मात्रा कम कर दी, मीडिया को कहानी पुरानी लगने लगी. अब तो वकील साहब भी चिडचिडाने लगे थे, लोगों ने फोन अटेंड करने बंद कर दिए थे ...कहानी काफी बोरिंग थी ना .
( अभी चलती रहेगी)

Saturday, February 12, 2011

टुनिशिया, मिस्र और यमन, अल्जीरिया




कल मिस्र में मुबारक के गद्दी छोड़ देने के बाद और पडोसी अफ्रीकी देशों में अचानक आयी क्रान्तियों के बाद देश दुनिया में लगातार यह कयास लग रहे हैं कि अफ्रीका में एक बड़ा बदलाव आयेगा. हाल ही में जिन बदलावों की बात की जा रही है वे हैं यमन और अल्जीरिया. जैसे ही मिस्र में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक नें गद्दी छोड़ने का ऐलान किया पड़ोसी देश अल्जीरिया में लोग सड़कों पर उतरने लगे. लगता है मिस्र में मुबारक के तख्तापलट के बाद लोकतंत्र की मांग का वायरल पूरे अफ्रीका में तेजी से फैलेगा.
यमन की राजधानी सना में कुछ दिनों पहले बुधवार के दिन जिस तरह विपक्षी पार्टियों ने विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया था और हड़बड़ी में प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला सालेह ने 2013 में बिना किसी उत्तराधिकार के गद्दी छोड़ने का ऐलान कर दिया था उससे देश दुनिया को यह लगने लगा कि मिस्र के बाद अब यमन ही स्वतंत्रता पाने वाला अगला देश होगा. मगर अगर अफ्रीका के इतिहास पर गौर करें तो यह साफ समझ आ जायेगा कि यमन की मुसीबतें कम नहीं हैं. यमन अफ्रीका के सबसे गरीब देशों में से एक है और प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला की जड़ें वहां काफी मजबूत बताई जातीं हैं. वैसे इसका एक उदाहरण बुधवार के बाद हुये प्रदर्शन में भी मिला जब 40 हजार की भीड़ सना यूनिवर्सिटी पर एकत्र हुयी मगर वहां न तो कोई गर्मागर्मी हुयी और न कोई बड़ी मांग. फिलहाल अल्जीरिया के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं. लोकतंत्र की मांग वहां भी रहरह कर उठती रही है. मगर हरबार राष्ट्रपति अब्दल अज़ीज़ बूतेफ्लिका की तानाशही अब तक के किसी भी प्रदर्शन पर भारी ही पड़ी है. मिस्र के घटनाक्रम से उत्साहित आज़ादी के समर्थकों नें जब एक विशाल रैली करने का फैसला किया तो राजधानी अल्जीयर्स में लोकतंत्र के समर्थन में होने वाली इस रैली पर प्रतिबंध लगा दिया गया. अल्जीयर्स में भारी मात्रा में पुलिस बल की तैनाती के कारण कोई भी बड़ा विरोध देखने को नहीं मिला और मिस्र की गर्म हवा का सीधा असर अल्जीरिया और यमन पर नहीं नहीं पड़ पाया. आजादी की इस आवाज को दबा दिया गया.
इतिहास गवाह है कि आन्दोलनों को शुरूआत में हमेशा ही दबाया गया है. इससे पहले भी टुनिशिया और मिस्र जैसे आंदोलनों की शुरुआत को रोकने के लिए जो कुछ किया गया वह किसी से छिपा नहीं है. दुनिया के अधिकतर देशों में परिवर्तन बड़ी मुश्किलों के बाद ही आया है. अफ्रीकी परिस्थितियों को देखते हुये सम्भव है कि क्रान्ति आने में कुछ देर लग जाय मगर यह तो तय है कि लोकतंत्र का बीज अफ्रीका में अंकुरित हो चुका है .

Friday, February 11, 2011

यमन का चमन अभी नहीं....

कल मिस्र में मुबारक के गद्दी छोड़ देने के बाद और अफ्रीकी देशों में अचानक आयी क्रान्तियों के बाद देश दुनिया में लगातार यह कयास लग रहे हैं कि अफ्रीका में एक बड़ा बदलाव आयेगा. हाल ही में जिस बदलाव की बात की जा रही है वह है यमन. राजधानी सना में कुछ दिनों पहले बुधवार के दिन जिस तरह विपक्षी पार्टियों ने विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया था और हड़बड़ी में प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला सालेह ने 2013 में बिना किसी उत्तराधिकार के गद्दी छोड़ने का ऐलान कर दिया था उससे देश दुनिया को यह लगने लगा कि मिस्र के बाद अब यमन ही स्वतंत्रता पाने वाला अगला देश होगा.
मगर अगर अफ्रीका के इतिहास पर गौर करें तो सह साफ समझ आ जायेगा कि यमन की मुसीबतें कम नहीं हैं. यमन अफ्रीका के सबसे गरीब देशों में से एक है और प्रेसीडेन्ट अली अब्दुल्ला की जड़ें वहां काफी मजबूत बताई जातीं हैं. वैसे इसका एक उदाहरण बुधवार के बाद हुये प्रदर्शन में भी मिला जब 40 हजार की भीड़ सना यूनिवर्सिटी पर एकत्र हुयी मगर वहां न तो कोई गर्मागर्मी हुयी और न कोई बड़ी मांग. दोपहर के बाद ही सड़कों पर सन्नाटा पसर गया और प्रदर्शनकारी नदारद रहे. खुद आयोजकों नें प्रदर्शनकारियों से यह मांग की कि वे वे पोस्टर उतार दें, बैनर फोल्ड कर लें और घर लौट जायें. विपक्ष की कमजोरी और यमन के पिछड़पन के कारण अभी संम्भानायें यहीं हैं कि क्रान्ति आने में अभी देर लगेगी.
{Photo:- BBC Hindi}

Tuesday, February 1, 2011

आओ आपको एक कहानी सुनाता हूं....(जो सच्ची है और गन्दी है)

पाकिस्तान में इस वक्त acid survivors bill पर बहस चल रही है. Acid attacks के लगातार बढ़ रहे cases को देखते हुये यह वक्त की जरुरत बन गयी है कि acid attacks पर कोई स्पेसिफिक law बनाया जाये. बांग्लादेश ने सबसे पहले (10 साल पहले) Acid Bill इन्ट्रोड्यूस करके इस दिशा में दूसरे देशों को अब दबाव की स्थिति में ला दिया था (इंडिया को नहीं).”

आओ आपको एक कहानी सुनाता हूं....

..............यह आरती की जिन्दगी है

आरती अब पढ़ाई पूरी कर चुकी है. टाइमपास करने का यह उसका यह आखिरी बहाना भी खत्म हो गया है. एमए करने के साथ ही उसने ब्यूटीपार्लर का भी कोर्स कर लिया था और अब खाना बनाने के साथ साथ वो टाइमपास के लिये अपनी आर्ट कापियों पर पेंटिग करती है. एक दो ट्यूशन पढाने के अलावा वह अब कुछ नही कर सकती. वह कही भी नार्मल फील नहीं करती है. बाहर जाकर जाब करना अब उसके लिये सम्भव नहीं. य़ह सब इसलिये क्योंकि आरती एक ऐसिड सर्वाइवर है.

आरती का बचपन कानपुर की उन गलियों में बीता है जिनको अब वह सपने में भी याद नहीं करना चाहती है. इसी कानपुर में उसने अपना पहला कदम रखा, बोलना सीखा, गिल्ली डंडा खेला, रोड पर खड़े होकर क्रिकेट मैच देखा और पतंग उड़ाने के लिये कई कई बार स्कूल बंक किया. 17 साल उसने यहां बड़े आराम से गुजारे. इन 17 सालों में आरती ने कई सारे दोस्त बनाये, जमकर पढ़ाई की और ढ़ेर सारे ख्वाब देखे. हर मिडिल क्लास लड़की की तरह आरती के भी ढ़ेर सारे सपने थे. सपना एक आलीशान घर का, एक लम्बी सी गाड़ी का और सबसे बड़ा सपना उस सपनों के राजकुमार का जो उसे वहां से उठाकर ख्वाबों की दुनिया मे ले जाने वाला था. सपनों के बीच अपनों की तलाश में उसकी मुलाकात अभिनव से होती है (मीडिया रिपोर्टस् के अनुसार, हालाकि मुझसे बातचीत के दौरान वह लगातार यह दोहराती है कि वह अनुभव को नहीं जानती थी ) और कुछ निजी कारणों से वह उस पर तेजाब डाल देता है. समझ लीजिये कि उसके सपनों पर तेजाब पड़ जाता है.

अब आज का दिन है जब आरती की आखों में कोई सपना नहीं है और सपनों में कोई राजकुमार नहीं है. पिछले 10 सालों में उसने यही उम्मीद की है कि कोई दिन ऐसा आयेगा जब वह आइने के सामने खड़ी हो सकेगी, खुद को हर सेकेंड़ के भयानक दर्द से राहत राहत दिला सकेगी, रास्ते चलते लोगों की उसे अजीब प्रजाति समझकर घूरने की आदत बन्द करा सकेगी. आशा तो उसे यह भी थी कि कम से कम अब तो तेजाब के खुले बाजार पर रोक लगेगी, उसके जैसे कइयों के लिये कोई कानून आयेगा, सरकारी राहत से वह मां बाप पर बोझ नहीं बनेगी.

(…………………to be continued in my next post)

Monday, January 3, 2011

काश शर्मीला, मै तुम्हे और तुम्हारी माँ को नए साल क़ी मुबारक बात दे सकता!




"अगर आप याद करें तो २००४ की वो घटना आप के जेहन में कहीं न कहीं जरुर आ जाएगी जिसमे मणिपुरी महिलाओं ने कपडे उतार कर असम रायफल्स के हेड क्वार्टर पर नग्न प्रदर्शन किया था ..वे एक बैनर लिए थी जिस पर लिखा था "इंडियन आर्मी , रेप मी".. इस घटना ने मीडिया का ध्यान पहली बार मणिपुर की ओर खीचा था .."




नव
वर्ष की हार्दिक और मंगलमय बधाइयों का सिलसिला अब खत्म हो रहा है. आश्चर्य है कि मुझे मेरे सभी दोस्त मित्रों ने फोन कर बधाईयाँ दी . कई ऐसे लोगों का भी फ़ोन आया जो लम्बे अरसे से मुझसे संपर्क में नहीं थे. कुल मिला कर हमने सबको याद किया और सबने हमको. अच्छा लगा कि लोगों की यादास्त अब तक कमजोर नहीं हुई है जैसा कि हमारे तमाम नेताबंधु सोचते है ..मगर मुझे कुछ चीजो का बड़ा अफ़सोस रहा ...इरोम शर्मीला की कहानी भी उनमें से एक है. अगर आप याद करें तो २००४ की वो घटना आप के जेहन में कहीं न कहीं जरुर आ जाएगी जिसमे मणिपुरी महिलाओं ने कपडे उतार कर असम रायफल्स के हेड क्वार्टर पर नग्न प्रदर्शन किया था ..वे एक बैनर लिए थी जिस पर लिखा था "इंडियन आर्मी , रेप मी".. इस घटना ने मीडिया का ध्यान पहली बार मणिपुर की ओर खीचा था

अब अगर आप को यह याद आ गया हो तो बताते चले की मणिपुर की ही एक लड़की इरोम शर्मीला ने २००१ में यह कसम खायी कि वह अपने राज्य से आर्म फ़ोर्स एस्पेसल पावर एक्ट को हटाये जाने तक अन्न जल ग्रहण नहीं करेगी . उसने यह भी कसम खायी कि जब तक यह एक्ट नहीं हटता वो अपनी माँ से नहीं मिलेगी ... यह ऐक्ट आर्म फोर्सेस को किसी भी व्यक्ति को बिना वारन्ट पकडने, पूछताछ करने और यहां तक कि गोली मारने का भी अधिकार देता है. गांधी की तरह ही शर्मीला नें भी अन्याय के खिलाफ लडाई में अहिंसा को अपना हथियार चुना.. तब से अब तक वहां न जाने कितने ही प्रदर्शन हुए हैं और न जाने कितने ही लोगों ने जाने दी हैं मगर एक्ट नहीं हटा ..इंडियन गवर्मेंट ने २००४ में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जीवन रेड्डी को जांच के आदेश दिए ..२००५ में उन्होंने अपनी रिपोर्ट सौपी जिसमे एक्ट को हटाने कि जोरदार सिफारिस क़ी गयी .. मगर आर्म फोर्सेस के दबाव में सरकार ने रिपोर्ट को ठन्डे बस्ते में डाल दिया
इस सबके बीच शर्मिला ने अपनी कसम वापस नहीं ली .. २००१ से अब तक उसने अन्न जल ग्रहण नहीं किया है ..पिछले दस सालों में वह अपनी माँ से कभी नहीं मिली .. हर साल वह ‘आत्महत्या के प्रयास’ में गिरफ्तार कर ली जाती है. अस्पताल के हाई सिक्योरिटी वार्ड़ में पड़े पड़े अब उसके शरीर के कई अंग बेकार होने लगे है ..उसे नाक में एक नली डाल कर पोषक तत्वों द्वारा जिन्दा रखा जा रहा है .. ..
2008 से इम्फाल में हर रोज कुछ महिलाएं वहां के कंगला फोर्ट पर इकठ्ठा होकर प्रदर्शन करती है और शर्मीला को उसके सत्यागृह में सहयोग देतीं है. हर साल जब भी मेरे दोस्त और पत्रकार मित्र मुझे फोन कर नए वर्ष क़ी बधाइयाँ देते है तो मेरे दिल में बस एक ही बात चुभने लगती है कि 'शर्मीला का नया साल कैसा रहा होगा'.... काश शर्मीला, मै तुम्हे और तुम्हारी माँ को नए साल क़ी मुबारक बात दे सकता!
आलोक दीक्षित
पत्रकार
दैनिक जागरण ग्रुप

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