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Tuesday, January 25, 2011

कुत्ता बनने की ख़ुशी

मेरी सबसे अच्छी बात
कि मै दुखी रहता हूँ
सोचता हूँ तो लगता है कि आहा क्या बात है !
वाह मजा आ गया कि मै दुखी रहता हूँ .

समझ पाना कठिन है
मगर सोंचो
अरे अगर खुश रहता तो क्या समझ पाता
कि दुनिया दुखी कैसे रहती है ?
माना कि किसी मूवी में देख लेता या किसी कहानी में पढ़ लेता कि
दुखी ऐसे हुआ जाता और कुढा ऐसे जाता है
या कुत्ता वैसे बन जाया जाता है

मगर बिना कुत्ता बने ये समझ पाना तो एकदम पोसिबल नहीं था ना !
अब जब भी कोई कहता है कि वो दुखी है
तो मै बड़ा खुश हो जाता हूँ
अरे सोरी मेरा मतलब है कि दुखी हो जाता हूँ
और लगता है जिंदगी में हर चीज काम आती है
कुता बनना भी .

Friday, January 7, 2011

........चींटी

सुमित्रा नंदन पन्त की यह रचना मैंने तब पढ़ी थी जब मै कक्षा नौ का छात्र था .....मुझे यह रचना बेहद पसंद थी

......चींटी


वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।

गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।

वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।

साभार : श्री सुमित्रानंदन पंत जी

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